हाई कोर्ट सेक्शन 11 के आदेश की मेरिट पर समीक्षा नहीं कर सकता; नियुक्ति प्रक्रिया अमान्य होने पर भी ‘सेवरेबिलिटी’ से मध्यस्थता क्लॉज वैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 (आर्बिट्रेशन एक्ट) के तहत एक बार आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) नियुक्त करने के बाद, हाईकोर्ट अपने ही आदेश की समीक्षा (Review) करके उसे वापस नहीं ले सकता। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के नियुक्ति आदेश को ‘रिव्यू’ याचिका के जरिए पलट दिया था।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के मामले में यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि धारा 11(6) के तहत नियुक्ति का आदेश देने के बाद कोर्ट ‘फंक्टस ऑफिसियो’ (जिसका आधिकारिक कार्य पूरा हो चुका हो) हो जाता है। इसके बाद आर्बिट्रेशन क्लॉज की वैधता को चुनौती केवल आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के समक्ष या धारा 34 के तहत दी जा सकती है, न कि रिव्यू याचिका के माध्यम से।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड (BRPNNL) द्वारा 4 मार्च 2014 को अपीलकर्ता (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) को दिए गए एक ठेके से जुड़ा है, जो औरंगाबाद और रोहतास जिलों में सोन नदी पर पुल निर्माण के लिए था। अनुबंध में विवादों के निपटारे के लिए ‘क्लॉज 25’ के तहत आर्बिट्रेशन का प्रावधान था।

शुरुआती अनुबंध अवधि के दौरान अतिरिक्त लागत को लेकर विवाद हुआ, जिसे 31 दिसंबर 2021 के एक आर्बिट्रल अवार्ड द्वारा सुलझा लिया गया। बाद में, अनुबंध की विस्तारित अवधि को लेकर नए विवाद सामने आए। जब BRPNNL के प्रबंध निदेशक (MD) ने आर्बिट्रेटर नियुक्त नहीं किया, तो अपीलकर्ता ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 11 के तहत पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने Truecaller ऐप को बैन करने से किया इनकार, कहा ये कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं

हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2021 को जस्टिस शिवाजी पांडेय (सेवानिवृत्त) को एकमात्र आर्बिट्रेटर नियुक्त किया। दोनों पक्षों ने तीन साल से अधिक समय तक कार्यवाही में हिस्सा लिया और धारा 29A के तहत आपसी सहमति और हाईकोर्ट के आदेशों से आर्बिट्रेटर का कार्यकाल भी बढ़ाया गया।

हालांकि, 4 अक्टूबर 2024 को हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों (Respondents) द्वारा दायर एक रिव्यू याचिका को स्वीकार कर लिया और आर्बिट्रेटर को कार्यवाही रोकने का निर्देश दिया। इसके बाद, 9 दिसंबर 2024 को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की आर्बिट्रेशन की मांग को खारिज कर दिया, जिससे चल रही पूरी प्रक्रिया निरस्त हो गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के पास अपने 18 अगस्त 2021 के आदेश की समीक्षा करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि आर्बिट्रेशन एक्ट अपने आप में एक पूर्ण कोड है और इसमें रिव्यू की शक्ति नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि प्रतिवादियों ने आर्बिट्रेशन में सक्रिय रूप से भाग लिया था, इसलिए उन्होंने आपत्ति का अधिकार खो दिया है।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि अनुबंध के क्लॉज 25 में एक “नेगेटिव कोवेनेंट” (नकारात्मक शर्त) है, जिसके अनुसार यदि प्रबंध निदेशक आर्बिट्रेटर नियुक्त नहीं कर पाते, तो “कोई आर्बिट्रेशन नहीं होगा”। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सेंट्रल ऑर्गनाइजेशन फॉर रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन (CORE) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि एकतरफा नियुक्ति (Unilateral Appointment) अवैध है, इसलिए पूरा आर्बिट्रेशन क्लॉज ही विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर विचार किया: धारा 11 के आदेश की समीक्षा करने का हाईकोर्ट का अधिकार, आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट की वैधता और वेवर (Waiver) का प्रश्न।

READ ALSO  निचली अदालत के जजों पर हाईकोर्ट द्वारा अनावश्यक टिप्पणी जमानत देने हेतु उनको हतोत्साहित करती है- सुप्रीम कोर्ट ने सत्र न्यायाधीश पर हाईकोर्ट की टिप्पणी को रद्द किया

1. धारा 11 के आदेशों की समीक्षा का अधिकार क्षेत्र

कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 5 में निहित “न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप” के सिद्धांत को दोहराया। इंटरप्ले बिटवीन आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट्स एंड स्टैम्प एक्ट (2024) के सात-जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 11 का दायरा केवल आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के अस्तित्व की ‘प्राइमा फेसी’ (प्रथम दृष्टया) जांच तक सीमित है।

जस्टिस महादेवन ने फैसले में लिखा:

“रिव्यू आदेश एक्ट की मूल भावना के खिलाफ है, यह न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के सिद्धांत को कमजोर करता है और प्रभावी रूप से रिव्यू को एक छिपी हुई अपील में बदल देता है। इस तरह की प्रक्रिया स्वीकार्य नहीं हो सकती।”

2. आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट की वैधता और ‘सेवेरबिलिटी’ (Severability)

कोर्ट ने क्लॉज 25 का विश्लेषण किया, जिसमें आर्बिट्रेशन को अनिवार्य बताया गया था लेकिन नियुक्ति का अधिकार सिर्फ एमडी को दिया गया था। कोर्ट ने TRF Ltd. और Perkins जैसे फैसलों का हवाला देते हुए माना कि सार्वजनिक अनुबंधों में एकतरफा नियुक्ति की शर्तें अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती हैं।

हालांकि, कोर्ट ने ‘सेवेरबिलिटी’ (पृथक्करण) के सिद्धांत को लागू किया। पीठ ने कहा:

“क्लॉज 25 का वह उप-खंड जो कहता है कि ‘यदि किसी कारण से मामला आर्बिट्रेशन के लिए नहीं भेजा जाता’, वह अस्पष्ट, अनिश्चित और मनमाना है… ऐसी शर्त धारा 18 का उल्लंघन करती है।”

कोर्ट ने अवैध हिस्से को अलग करते हुए कहा कि “आर्बिट्रेशन के लिए मुख्य समझौता (substantive agreement) बरकरार रहता है।”

3. वेवर (Waiver) और धारा 29A

कोर्ट ने इस पर भी विचार किया कि क्या धारा 29A के तहत समय बढ़ाने के लिए संयुक्त आवेदन देना आपत्तियों का त्याग (Waiver) माना जाएगा। कोर्ट ने धारा 12(5) (सातवीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता को माफ करने के लिए आवश्यक “लिखित समझौते” और धारा 4 के तहत आचरण द्वारा सामान्य वेवर के बीच अंतर स्पष्ट किया।

READ ALSO  Rental or Damages Payable Only When Possession Is Unlawfully Retained Before Acquisition: Supreme Court

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“धारा 29A के तहत एक संयुक्त आवेदन धारा 4 के तहत एक वैध वेवर (त्याग) है, सिवाय उन मामलों के जहां धारा 12(5) के तहत वैधानिक अयोग्यता हो।”

चूंकि इस मामले में कोर्ट ने आर्बिट्रेटर नियुक्त किया था, इसलिए सातवीं अनुसूची की अयोग्यता लागू नहीं होती थी, और प्रतिवादियों का विस्तार (Extension) मांगना धारा 4 के तहत उनकी सहमति मानी गई।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और पटना हाईकोर्ट के 9 दिसंबर 2024 के फैसले को रद्द कर दिया।

प्रमुख निर्देश:

  1. आर्बिट्रेशन बहाल: कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू करना अन्यायपूर्ण होगा।
  2. वैकल्पिक आर्बिट्रेटर की नियुक्ति: हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह दो सप्ताह के भीतर एक वैकल्पिक आर्बिट्रेटर नियुक्त करे, जो वहीं से कार्यवाही आगे बढ़ाएंगे जहां रोकी गई थी।
  3. समय सीमा: नए आर्बिट्रेटर को एक वर्ष के भीतर कार्यवाही पूरी करने का प्रयास करना होगा।
  4. अधिकारियों को चेतावनी: कोर्ट ने BRPNNL के प्रबंध निदेशक के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की।
    “सार्वजनिक अधिकारी जनता के विश्वास के संरक्षक होते हैं, केवल प्रशासक नहीं। इस तरह की लापरवाही की पुनरावृत्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी या व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है।”

कोर्ट ने लागत (Cost) नहीं लगाई, लेकिन अधिकारी को अनुबंध संबंधी दायित्वों के प्रति उदासीनता के लिए “कड़ी चेतावनी” जारी की।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles