हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट के बिना FIR रद्द करना ‘पूरी तरह अनुचित’: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें जालसाजी और धोखाधड़ी से जुड़ी एक FIR को निरस्त कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब महत्वपूर्ण फॉरेंसिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा हो, तो अदालतों को आपराधिक कार्यवाही को समय से पहले समाप्त नहीं करना चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जब स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (SFSL) द्वारा हस्ताक्षरों की वास्तविकता की जांच की जा रही हो, तब FIR को रद्द करना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों का अनुचित प्रयोग है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मूल रूप से शिकायतकर्ता शारला बज़्लिएल द्वारा शिमला के स्टेट CID पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई FIR नंबर 8/22 से संबंधित है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपी बलदेव ठाकुर, दलजीत सिंह और जिएनपुरी कामसुआन ने उनके दिवंगत पिता डॉ. जी.बी. बज़्लिएल की पैतृक संपत्ति और बैंक जमा को हड़पने के लिए आपराधिक साजिश रची।

FIR के अनुसार, आरोपियों ने 2013 में शिकायतकर्ता की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता की कमजोर मानसिक और शारीरिक स्थिति का फायदा उठाया। आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने धोखाधड़ी से पिता को दलजीत सिंह को बैंक नॉमिनी नियुक्त करने के लिए राजी किया और लगभग ₹1.18 करोड़ उनके खातों में स्थानांतरित कर दिए। इसके अलावा, लगभग 50 बीघा पैतृक भूमि को फर्जी हस्ताक्षरों और गलत तथ्यों के आधार पर बाजार दर से काफी कम कीमत पर बलदेव ठाकुर के नाम स्थानांतरित कर दिया गया।

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हाईकोर्ट का निर्णय

8 जनवरी 2024 को, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने आरोपियों द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए FIR को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला था कि धोखाधड़ी, गलत बयानी या जालसाजी के आवश्यक तत्व नहीं पाए गए और आरोपों को केवल “अटकलें” करार दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस बात के लिए आलोचना की कि उसने जांच के शुरुआती चरण में ही हस्तक्षेप किया, जबकि महत्वपूर्ण सामग्री एकत्र की जानी बाकी थी। पीठ ने ध्यान दिलाया कि जांच अधिकारी ने हाईकोर्ट के आदेश से पहले ही संदिग्ध दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए SFSL, जुंगा भेज दिया था।

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अदालत ने कहा:

“हम यह देख सकते हैं कि जहां FIR में जालसाजी के आरोप लगाए गए हैं और जांच एजेंसी ने दस्तावेजों की जांच हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से कराने की कवायद शुरू कर दी है, वहां हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना FIR को रद्द करने का आदेश पूरी तरह से अनुचित होगा।”

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि अपील के लंबित रहने के दौरान, 26 जून और 31 अगस्त 2024 की SFSL रिपोर्ट प्राप्त हुई हैं। इन रिपोर्टों से पुष्टि हुई है कि बैंक दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षर शिकायतकर्ता के पिता के असली हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते हैं, बल्कि वे “फैसिमाइल स्टैम्प” (मुहर) प्रतीत होते हैं।

कोर्ट ने मीर नकवी असकरी बनाम सीबीआई (2009) मामले पर हाईकोर्ट की निर्भरता को भी खारिज कर दिया और कहा कि जालसाजी का प्रमाण विशेषज्ञों द्वारा की जाने वाली तुलना पर निर्भर था, इसलिए अभियोजन को “शुरुआत में ही दबाया” नहीं जा सकता था।

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अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि FIR में लगाए गए आरोप और एकत्र की गई सामग्री—जिसमें बाद की SFSL रिपोर्ट भी शामिल है—आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त है।

पीठ ने जांच अधिकारी को जल्द से जल्द जांच पूरी कर परिणाम पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोप पत्र (CrPC की धारा 173(2) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 193(3) के तहत) पहले ही दाखिल किया जा चुका है, तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार मामले में आगे बढ़ेगा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: शारला बज़्लिएल बनाम बलदेव ठाकुर और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या ___/2026 (SLP(Crl.) संख्या 3533/2024 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • निर्णय की तिथि: 17 मार्च, 2026

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