संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण शक्तियों के प्रयोग में न्यायिक संयम की आवश्यकता को दोहराते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि हाईकोर्ट को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को जांच सौंपने से पहले प्राथमिक दृष्टया साक्ष्य की उपस्थिति सुनिश्चित करनी चाहिए। यह निर्णय क्रिमिनल अपील सं. ___ ऑफ 2025 [SLP (Crl.) No. 8403/2024 से उत्पन्न] के मामले विनय अग्रवाल बनाम राज्य हरियाणा एवं अन्य में सुनाया गया, जिसमें अपीलकर्ता ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मई 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें जबरन वसूली और छद्म रूप धारण के मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी।
यह निर्णय न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ द्वारा दिया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने अपीलकर्ता विनय अग्रवाल की ओर से पक्ष रखा, जबकि हरियाणा राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता श्रीमती निर्मला नेगी पेश हुईं। शिकायतकर्ता, फार्मा व्यवसायी जगबीर सिंह, की ओर से अधिवक्ता संदीप सिंह ने पक्ष रखा।
पृष्ठभूमि:

यह मामला एफआईआर संख्या 215/2022 से जुड़ा है, जो थाना सेक्टर 20, पंचकूला में विनय अग्रवाल के खिलाफ दर्ज हुई थी। आरोप था कि अग्रवाल ने खुफिया ब्यूरो (IB) के इंस्पेक्टर जनरल (IG) के रूप में खुद को प्रस्तुत कर शिकायतकर्ता को 1.49 करोड़ रुपये जबरदस्ती और धोखे से अपने सहयोगियों के साथ व्यवसाय करने के लिए मजबूर किया। सह-आरोपी डॉ. कोमल खन्ना भी इनमें शामिल थीं।
दिलचस्प रूप से, इससे पहले शिमला, हिमाचल प्रदेश में भी एफआईआर संख्या 01/2022 इसी प्रकार के आरोपों पर अग्रवाल के खिलाफ दर्ज हुई थी, जिसे जनवरी 2025 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था और कहा था कि यह आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और दीवानी विवादों को फौजदारी रंग देने का प्रयास है।
पंचकूला मामले में शिकायतकर्ता ने जांच को CBI को सौंपने की मांग की थी, जिसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मई 2024 में यह कहते हुए अनुमति दी कि स्थानीय पुलिस की मिलीभगत और अक्षमता पर संदेह है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण एवं निर्णय:
हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे जांच CBI को सौंपना आवश्यक प्रतीत होता। अदालत ने चेतावनी दी कि केवल आरोपी की स्थानीय पुलिस से निकटता का आरोप लगाना अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण अधिकारों के प्रयोग के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा:
“CBI जांच का निर्देश केवल उन्हीं मामलों में दिया जाना चाहिए जहाँ प्राथमिक दृष्टया सामग्री कुछ ऐसा संकेत देती हो जो CBI जांच की आवश्यकता को दर्शाए। यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए और न ही कुछ अस्पष्ट आरोपों के आधार पर ऐसा किया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने State of West Bengal बनाम Committee for Protection of Democratic Rights [(2010) 3 SCC 571] के संविधान पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए दोहराया कि यद्यपि संवैधानिक न्यायालयों को CBI जांच का निर्देश देने की शक्ति है, परंतु इसका प्रयोग “बहुत सोच-समझकर, सावधानीपूर्वक और विशेष परिस्थितियों” में ही किया जाना चाहिए।
निर्णय में यह भी कहा गया:
“यह असाधारण शक्ति केवल उन्हीं मामलों में प्रयोग होनी चाहिए जहाँ जांच की निष्पक्षता बनाए रखने और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो… अन्यथा CBI पर अत्यधिक भार पड़ जाएगा और सीमित संसाधनों के चलते वह गंभीर मामलों की भी प्रभावी जांच करने में अक्षम हो सकती है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि पंचकूला पुलिस आयुक्त द्वारा एक सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया था और जांच विधिवत रूप से आगे बढ़ रही थी। आरोपी के स्थानीय पुलिसकर्मियों के साथ देखे जाने का आरोप “अस्पष्ट और निराधार” बताया गया।
पीठ ने टिप्पणी की:
“मान भी लें कि अपीलकर्ता खुद को आईपीएस अधिकारी के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, फिर भी यह विश्वास करना कठिन है कि शिकायतकर्ता को अक्टूबर 2022 तक सच्चाई का पता नहीं चला।”
CBI अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला:
अदालत ने सह-आरोपी डॉ. कोमल खन्ना द्वारा दाखिल अवमानना याचिका पर भी विचार किया, जिसमें कहा गया था कि CBI ने 9 जुलाई 2024 को एफआईआर दर्ज की, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 27 जून 2024 को अंतरिम रोक लगा दी थी। इस पर CBI के विशेष अपराध शाखा प्रमुख डॉ. नवदीप सिंह ब्रार (IPS) उपस्थित हुए और बिना शर्त माफी मांगी, यह कहते हुए कि रोक आदेश की जानकारी न होने के कारण यह गलती हुई।
अदालत ने माफी स्वीकार करते हुए, केस फाइल्स हरियाणा पुलिस को लौटाए जाने की बात ध्यान में रखी और अवमानना नोटिस समाप्त कर याचिका निस्तारित कर दी।
अंतिम आदेश:
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का 17 मई 2024 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि CBI को जांच सौंपने का निर्देश समय से पहले और बिना उचित आधार के दिया गया था। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया कि यह निर्णय केवल जांच स्थानांतरण से संबंधित है और इसका एफआईआर संख्या 215/2022 में चल रही जांच पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो कि निष्पक्ष और विधिसम्मत ढंग से जारी रहनी चाहिए।