विभागीय जांच में क्लीन चिट के बावजूद ग्रेच्युटी रोकना वैध, यदि आपराधिक कार्यवाही लंबित है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972’ के नियम 69(1)(c) के तहत ग्रेच्युटी के भुगतान पर तब तक रोक बनी रहती है जब तक कि विभागीय या न्यायिक कार्यवाही में से कोई भी एक लंबित हो।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 7 अप्रैल, 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि नियम में इस्तेमाल किया गया शब्द “या” (or) एक विकल्प के रूप में है। इसका अर्थ यह है कि जब तक दोनों में से कोई भी कार्यवाही जारी है, तब तक राज्य के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, बिक्रम चंद राणा, 1979 में निगम में क्लर्क के रूप में नियुक्त हुए थे और 2000 में वरिष्ठ सहायक बने। वे 28 फरवरी, 2009 को सेवानिवृत्त हुए। 2006 में उन पर ‘कंबाइंड प्री-मेडिकल टेस्ट’ (CPMT) के प्रश्न पत्र लीक करने में शामिल होने का आरोप लगा, जिसके बाद आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। साथ ही, निगम ने उनके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू की।

26 फरवरी, 2009 की अपनी रिपोर्ट में जांच अधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो प्रश्न पत्र लीक में राणा की संलिप्तता साबित करे। हालांकि, जांच अधिकारी ने यह भी दर्ज किया:

“….इसके अलावा, मामला माननीय न्यायालय के विचाराधीन है और न्यायालय के निर्णय तक कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। दस्तावेजों के आधार पर ऐसा नहीं लगता कि आरोपी घोटाले में शामिल था।”

READ ALSO  जेजे एक्ट की धारा 7A के तहत जुवेनाइलिटी का सवाल सिर्फ ट्रायल कोर्ट/हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट ही तय कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें प्रोविजनल पेंशन तो दी गई, लेकिन लंबित आपराधिक मामले के कारण उनकी ग्रेच्युटी रोक ली गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने दलील दी कि चूंकि विभागीय जांच उनके पक्ष में समाप्त हो चुकी है (जिसमें मई 2015 में आरोपों को “साबित नहीं” पाया गया), इसलिए ग्रेच्युटी जारी की जानी चाहिए। उनका तर्क था कि नियम 69(1)(c) में “विभागीय या न्यायिक कार्यवाही” शब्द का अर्थ यह है कि दोनों में से किसी भी एक कार्यवाही के समाप्त होने पर ग्रेच्युटी देय हो जाती है।

राणा ने पेंशन नियमों के नियम 9(1) का भी हवाला दिया और कहा कि यदि भविष्य में वे दोषी पाए जाते हैं, तो भुगतान की गई राशि की वसूली की जा सकती है। वहीं, निगम ने तर्क दिया कि लंबित आपराधिक मुकदमा एक “न्यायिक कार्यवाही” है, जो ग्रेच्युटी रोकने के वैधानिक आधार को बनाए रखता है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि यह एक “असंगत परिणाम” पेश करेगी। कोर्ट ने अवलोकन किया:

“नियम 69(1)(c) एक ‘प्रतिबंध’ या वैधानिक रोक के रूप में कार्य करता है, न कि अधिकार देने वाले प्रावधान के रूप में। सामान्य ‘या’ (or) का उपयोग इस रोक के दायरे को बढ़ाता है, जो यह दर्शाता है कि जब तक विभागीय या न्यायिक कार्यवाही लंबित है, तब तक ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया जाएगा।”

कोर्ट ने बाबू मनमोहन दास शाह बनाम बिशुन दास (1967) के मामले का हवाला देते हुए कहा कि “या” शब्द का अर्थ तब तक उसके सामान्य अर्थ में ही लिया जाना चाहिए जब तक कि वह किसी विसंगति की ओर न ले जाए। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता की व्याख्या को स्वीकार करने से उस प्रावधान का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, जो राज्य के वित्तीय हितों की रक्षा करना है।

READ ALSO  Jharkhand MNREGA scam: SC refuses pre-arrest bail to suspended IAS officer's husband

कोर्ट ने दोनों कार्यवाहियों के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा:

“मौजूदा मामले में भी, जहां दोनों कार्यवाहियां समान आरोपों से उत्पन्न हुई हैं, उनकी प्रकृति, दायरा और सबूतों का मानक मौलिक रूप से अलग रहता है।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया। कोर्ट ने माना कि भले ही अपीलकर्ता की उम्र अधिक है और अन्य आरोपी छात्र 2016 में बरी हो चुके हैं, लेकिन ये तथ्य नियम 69(1)(c) के तहत ग्रेच्युटी रोकने की वैधानिक स्थिति को नहीं बदल सकते।

अपील खारिज कर दी गई, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को इस मामले से जुड़े मुकदमे में तेजी लाने का निर्देश दिया है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को ड्रग्स मामले में एसआईटी के साथ सहयोग करने का आदेश दिया

केस विवरण:

  • केस का नाम: बिक्रम चंद राणा बनाम हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम
  • सिविल अपील संख्या: 14669/2025
  • पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
  • फैसले की तारीख: 07 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles