सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन (Money Laundering) के एक मामले में अमटेक ऑटो लिमिटेड (AAL) के पूर्व प्रमोटर और गैर-कार्यकारी अध्यक्ष अरविंद धाम को नियमित जमानत दे दी है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि मुकदमा (Trial) शुरू हुए बिना आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत अपराध की गंभीरता आरोपी को अनिश्चित काल तक जेल में रखने को सही ठहरा सकती है, खासकर तब जब मुकदमा शुरू नहीं हुआ हो और जल्द खत्म होने की संभावना न हो। न्यायालय ने जमानत के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि PMLA की धारा 45 के वैधानिक प्रतिबंध त्वरित सुनवाई के संवैधानिक अधिकार पर हावी नहीं हो सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 21 दिसंबर, 2022 को IDBI बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शिकायतों पर दर्ज की गई एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। इन एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B, 420, 406, 468 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) और 13(1)(d) के तहत क्रमशः 385.35 करोड़ रुपये और 289 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था।
इन आरोपों के आधार पर, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 21 मार्च, 2023 को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में दो ECIR दर्ज कीं। अरविंद धाम पर मुख्य आरोप यह था कि वे सार्वजनिक धन की हेराफेरी की एक सुनियोजित योजना के “अंतिम लाभार्थी” (ultimate beneficiary) थे, जिसे विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से अंजाम दिया गया था।
समन जारी होने पर धाम 19 जून, 2024 को ED के समक्ष पेश हुए और बाद में 9 जुलाई, 2024 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मामले में 6 सितंबर, 2024 को अभियोजन पक्ष की शिकायत (Prosecution Complaint) दर्ज की गई और 2 अगस्त, 2025 को 40 आरोपियों के खिलाफ एक पूरक शिकायत दायर की गई।
इससे पहले, विशेष न्यायाधीश ने 21 जनवरी, 2025 को धाम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 और PMLA की धारा 45 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 19 अगस्त, 2025 को हाईकोर्ट ने भी उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (अरविंद धाम) का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता की उम्र 64 वर्ष है और वे कई बीमारियों से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि धाम लगभग 16 महीने और 20 दिन से हिरासत में हैं और उनकी लंबी कैद अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकारों का हनन है।
प्रमुख दलीलें:
- जांच पूरी हो चुकी है: वकील ने विशेष अदालत के 20 अगस्त, 2025 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अपीलकर्ता के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है।
- देरी अभियोजन पक्ष के कारण: यह तर्क दिया गया कि मुकदमे में आठ महीने की देरी ED के कारण हुई, जिसने प्रस्तावित आरोपियों को जारी नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस याचिका के कारण विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाही पर रोक लग गई थी, जिसे 23 मई, 2025 को ED द्वारा याचिका वापस लेने के बाद ही हटाया गया।
- सहयोग: अपीलकर्ता ने जांच में सहयोग किया है। गवाह अनुराधा कपूर को प्रभावित करने के आरोप को “अविश्वसनीय” बताया गया क्योंकि जब उन्हें गवाह बनाया गया, तब धाम पहले से ही हिरासत में थे।
- संपत्ति का निपटान नहीं: यह कहा गया कि पानीपत और अलवर में संपत्तियों के निपटान की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी और वे मेसर्स मारीचिका प्रॉपर्टीज के निदेशक नहीं थे।
प्रतिवादी (ED) का पक्ष: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया:
- अपराध की गंभीरता: अपराध की गंभीरता के कारण अपीलकर्ता PMLA की धारा 45 की दोहरी शर्तों (twin conditions) से छूट का हकदार नहीं है।
- गवाहों को प्रभावित करना: आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और उन्होंने अपनी चचेरी बहन और “डमी निदेशक” अनुराधा कपूर को जांच में शामिल न होने का निर्देश दिया था।
- संपत्ति खुर्द-बुर्द करना: ED ने दावा किया कि कुर्की के बाद भी अपीलकर्ता ने अपराध की आय (Proceeds of Crime), विशेष रूप से अचल संपत्तियों को बेच दिया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आर्थिक अपराधों में जमानत न्यायशास्त्र (bail jurisprudence) पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
अपराध की गंभीरता बनाम अनुच्छेद 21 पीठ ने स्वीकार किया कि अपराध की गंभीरता एक प्रासंगिक कारक है, लेकिन कहा कि इसे सजा की अवधि और परिस्थितियों के साथ देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा:
“संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित त्वरित सुनवाई का अधिकार अपराध की प्रकृति से धूमिल नहीं होता है। मुकदमे की शुरुआत या उचित प्रगति के बिना विचाराधीन कैदी की लंबी कैद को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसका प्रभाव pretrial detention (मुकदमे से पहले की हिरासत) को सजा में बदलने जैसा होता है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि आर्थिक अपराधों को केवल गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार करने के लिए एक “सजातीय वर्ग” (homogeneous class) के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।
मुकदमे में देरी कोर्ट ने नोट किया कि 28 व्यक्तियों में से केवल अपीलकर्ता को गिरफ्तार किया गया था। यह पाया गया कि मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, संज्ञान (cognizance) नहीं लिया गया है और मामला अभी भी दस्तावेजों की जांच के चरण में है।
देरी के कारण के संबंध में, कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
“प्रतिवादी (ED) ने हाईकोर्ट के समक्ष आदेश [दिनांक 07.09.2024] को चुनौती दी थी, जिसके परिणामस्वरूप विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाही पर आठ महीने की रोक लग गई थी। यह रोक 23.05.2025 को याचिका वापस लेने पर ही हटाई गई थी। इस प्रकार मुकदमे में देरी केवल प्रतिवादी के कारण है, अपीलकर्ता के कारण नहीं।”
गवाहों को प्रभावित करने और संपत्ति बेचने के आरोप कोर्ट ने गवाहों को प्रभावित करने और संपत्ति खुर्द-बुर्द करने की ED की आशंकाओं को खारिज कर दिया।
- गवाहों को प्रभावित करना: कोर्ट ने अनुराधा कपूर से संबंधित आरोप को “पूरी तरह से अविश्वसनीय” पाया, क्योंकि अपीलकर्ता 9 जुलाई, 2024 से हिरासत में थे, जबकि सुश्री कपूर को 2 अगस्त, 2025 को ही गवाह बनाया गया था।
- संपत्ति का निपटान: मेसर्स मारीचिका प्रॉपर्टीज की संपत्तियों के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि “अपीलकर्ता से कोई भौतिक संबंध स्थापित नहीं हुआ है” और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वे किसी बिक्री दस्तावेज के हस्ताक्षरकर्ता थे। कोर्ट ने इस आरोप को “इस स्तर पर अस्थिर” (untenable) करार दिया।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 19 अगस्त, 2025 के फैसले और आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अरविंद धाम को जमानत पर रिहा किया जाए, जो ECIR केस संख्या ECIR/GNZO/13/2024 और ECIR/GNZO/14/2024 में मुकदमे के लंबित रहने तक जारी रहेगी।
अदालत द्वारा लगाई गई शर्तें:
- जमानत के नियम और शर्तें ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की जाएंगी।
- अपीलकर्ता को ED अधिकारियों को अपना ठिकाना सुनिश्चित करने के लिए एक टेलीफोन/मोबाइल नंबर देना होगा।
- अपीलकर्ता को अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करना होगा।
- अपीलकर्ता ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेंगे।
केस विवरण
- वाद शीर्षक: अरविंद धाम बनाम प्रवर्तन निदेशालय
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (@S.L.P. (Crl.) No. 15478 of 2025)
- पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे

