सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ हरियाणा पुलिस की एसआईटी द्वारा दाखिल चार्जशीट पर ट्रायल कोर्ट को संज्ञान लेने से रोकने के अपने पूर्व आदेश को आगे बढ़ा दिया है। यह मामला ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिस पर दो एफआईआर दर्ज की गई थीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह आदेश उस वक्त पारित किया जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने अदालत को बताया कि अगस्त 2025 में चार्जशीट दाखिल की गई थी, लेकिन अभी तक हरियाणा सरकार की ओर से अभियोजन स्वीकृति (sanction) नहीं दी गई है।
ASG राजू ने राज्य सरकार से स्पष्ट निर्देश लेने के लिए और समय मांगा और संकेत दिया कि सरकार “एक बारगी उदारता” (one-time magnanimity) के तौर पर अभियोजन की अनुमति न देने का निर्णय ले सकती है, जिससे मामला बंद हो सकता है।
कोर्ट ने उन्हें निर्देश लेने के लिए छह सप्ताह का समय दिया और अगली सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध कर दिया। हालांकि, पीठ ने प्रोफेसर को इस दौरान जिम्मेदार आचरण की नसीहत भी दी।
मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा, “हम यह भी नहीं चाहते कि जैसे ही सरकार अभियोजन की अनुमति न देने का फैसला करे, आप जाकर जो मन में आए वह लिखना शुरू कर दें। अगर वो लोग उदारता दिखा रहे हैं तो आपको भी जिम्मेदारी से व्यवहार करना होगा।”
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो महमूदाबाद की ओर से पेश हुए, ने कहा कि इस मामले में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।
मामला मई 2025 में प्रोफेसर महमूदाबाद द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर की गई सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है। यह ऑपरेशन भारत पर हुए आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई थी। इस पर की गई टिप्पणियों को लेकर प्रोफेसर के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज हुईं—एक हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष रेनू भाटिया की शिकायत पर और दूसरी एक ग्राम प्रधान की शिकायत पर। दोनों एफआईआर सोनीपत जिले के राय थाना में दर्ज की गईं।
उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है:
- धारा 152 — भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य
- धारा 353 — लोक अशांति फैलाने वाले बयान
- धारा 79 — महिला की मर्यादा का अपमान करने वाली जानबूझकर की गई कार्रवाई
- धारा 196(1) — धर्म के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाना
उनकी गिरफ्तारी के बाद अकादमिक जगत और राजनीतिक दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया था।
सुप्रीम कोर्ट में अब तक की कार्यवाही
- 21 मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने महमूदाबाद को अंतरिम ज़मानत दी, लेकिन जांच पर रोक लगाने से इनकार किया। साथ ही, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा या सशस्त्र बलों की कार्रवाई से जुड़े विषयों पर कोई राय व्यक्त करने से मना किया।
- 28 मई 2025: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोफेसर के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहेगी, लेकिन उस विशेष प्रकरण पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं दी गई।
- 16 जुलाई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा एसआईटी की जांच की दिशा पर सवाल उठाए और कहा कि उसने “खुद को गलत दिशा में ले जाया।” कोर्ट ने आदेश दिया कि जांच सिर्फ दो एफआईआर तक सीमित रहे और चार सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल की जाए।
- अगस्त 2025: चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन अभियोजन स्वीकृति के अभाव में ट्रायल कोर्ट आगे नहीं बढ़ सका।
अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक राज्य सरकार अभियोजन की अनुमति पर कोई निर्णय नहीं लेती, तब तक निचली अदालत चार्जशीट पर संज्ञान नहीं ले सकती।

