EWS आरक्षण के लिए कट-ऑफ डेट तक निर्धारित वित्तीय वर्ष का वैध प्रमाण पत्र होना अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य कार्यकर्ता (महिला) के पद के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ चाहने वाली महिला उम्मीदवारों की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि EWS आरक्षण का दावा करने के लिए उम्मीदवार के पास आवेदन की अंतिम तिथि (कट-ऑफ डेट) को या उससे पहले, निर्धारित प्रारूप में और संबंधित वित्तीय वर्ष का आय एवं संपत्ति प्रमाण पत्र होना अनिवार्य है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले की पुष्टि की, जिसने उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नए प्रमाण पत्र जमा करने की अनुमति देने वाले सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 15 दिसंबर, 2021 को स्वास्थ्य कार्यकर्ता (महिला) के 9,212 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसमें 10% सीटें (921 पद) EWS श्रेणी के लिए आरक्षित थीं। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 5 जनवरी, 2022 निर्धारित की गई थी।

अपीलकर्ताओं ने EWS श्रेणी के तहत आवेदन किया था, लेकिन 6 अगस्त, 2022 को घोषित अंतिम योग्यता सूची में उनका नाम शामिल नहीं था। आयोग ने उनके दावों को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण पत्र या तो सही वित्तीय वर्ष के नहीं थे या संबंधित वित्तीय वर्ष के समाप्त होने से पहले ही जारी कर दिए गए थे।

उम्मीदवारों ने पहले हाईकोर्ट का रुख किया, जहां सिंगल जज ने अधिकारियों को वित्तीय वर्ष 2020-2021 के लिए सही प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ताओं का तर्क था कि प्रमाण पत्रों में कोई भी त्रुटि उन सरकारी एजेंसियों की गलती थी जिन्होंने उन्हें जारी किया था। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के आदेशों में “वित्तीय वर्ष” के विवरण को लेकर भ्रम की स्थिति थी। उनका यह भी कहना था कि चूंकि वे पात्र थे और उन्होंने EWS श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त किए थे, इसलिए उन्हें तहसील कार्यालय की तकनीकी त्रुटियों के कारण लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

राज्य (प्रतिवादियों) ने तर्क दिया कि विज्ञापन और उत्तर प्रदेश लोक सेवा (आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 2020 में स्पष्ट रूप से प्रावधान था कि “आवेदन के वर्ष से ठीक पहले वाले वित्तीय वर्ष” की आय पर विचार किया जाएगा। उनका कहना था कि 5 जनवरी, 2022 की कट-ऑफ डेट तक अपीलकर्ताओं के पास वित्तीय वर्ष 2020-2021 का वैध प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं था।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने विज्ञापन की धारा 8.3 और निर्धारित फॉर्म-1 का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने नोट किया कि आवेदन की अंतिम तिथि 5 जनवरी, 2022 होने के कारण, प्रासंगिक पिछला वित्तीय वर्ष 2020-2021 (1 अप्रैल, 2020 से 31 मार्च, 2021) था। अतः, एक वैध प्रमाण पत्र 1 अप्रैल, 2021 से 5 जनवरी, 2022 के बीच की तारीख का होना चाहिए था।

प्रमाण पत्रों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने पाया:

  • कई प्रमाण पत्र जनवरी या फरवरी 2021 में जारी किए गए थे, जिसका अर्थ है कि वे वित्तीय वर्ष 2020-2021 के समाप्त होने से पहले ही जारी कर दिए गए थे।
  • एक उम्मीदवार, सुनीता कुमारी ने 2020-2021 के बजाय वित्तीय वर्ष 2021-2022 का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था।

कोर्ट ने यूपीएससी बनाम गौरव सिंह (2024) और दिव्या बनाम भारत संघ (2024) के पिछले फैसलों का हवाला दिया। गौरव सिंह मामले में कोर्ट ने कहा था कि अलग वित्तीय वर्ष का प्रमाण पत्र “उम्मीदवार की पात्रता की जड़ पर प्रहार करता है।” वहीं दिव्या मामले में यह स्थापित हुआ था कि कट-ऑफ डेट तक प्रमाण पत्र उम्मीदवार के पास होना चाहिए।

अधिकारियों की गलती के तर्क पर कोर्ट ने कहा:

“यह तर्क कि राज्य को उन वित्तीय वर्षों के प्रमाण पत्र जारी नहीं करने चाहिए थे जो जारी करने की तिथि तक समाप्त नहीं हुए थे, निराधार है क्योंकि वे प्रमाण पत्र विज्ञापन के प्रकाशन की तिथि से भी पहले प्राप्त किए गए थे।”

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि विज्ञापन प्रकाशित होने के बाद उम्मीदवार नए और नियमसंगत प्रमाण पत्रों के लिए आवेदन कर सकते थे।

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को खारिज करते हुए निष्कर्ष निकाला कि आयोग द्वारा दावों को अस्वीकार करना उचित था। कोर्ट ने बड़े स्तर पर होने वाली सार्वजनिक भर्तियों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर एक चेतावनी भी जारी की।

अदालत ने टिप्पणी की:

“समापन से पहले, हम यह कहना चाहेंगे कि सार्वजनिक भर्ती के मामलों में… आवेदन कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के माध्यम से संसाधित किए जाते हैं, इसलिए आवेदन में किसी भी त्रुटि का परिणाम उम्मीदवारी की अस्वीकृति के रूप में होना तय है। ऐसी अस्वीकृति के खिलाफ चुनौती को आमतौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह भर्ती प्रक्रिया को समय पर पूरा होने से रोक सकता है, जिससे लाखों आकांक्षी निराश हो सकते हैं।”

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: पूनम द्विवेदी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ 2026 की (@SLP (C) संख्या 4001-4002, 2023 की)
  • पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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