सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना मामले में मुआवजा बढ़ाया; कहा- किसान की आय केवल खेती तक सीमित नहीं, पशुपालन भी अहम योगदान

सुप्रीम कोर्ट ने एक मृतक किसान और दूध विक्रेता के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे में बढ़ोतरी की है। कोर्ट ने किसान द्वारा परिवार की आजीविका में दिए जाने वाले योगदान को व्यापक और अहम मानते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने मृतक की मासिक आय का आकलन 5,000 रुपये से बढ़ाकर 8,000 रुपये कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि खेती करने वाले अक्सर परिवार की सुख-सुविधा सुनिश्चित करने के लिए पशुपालन और दूध बेचने जैसे कार्यों से अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय विश्नोई की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए कुल मुआवजे को ब्याज सहित बढ़ाकर 22,66,694 रुपये कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील 22 नवंबर 2014 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ी है, जिसमें सालिग्राम नामक व्यक्ति की मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी, बेटे और बेटी ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), इंदौर का दरवाजा खटखटाया। दुर्घटना के समय मृतक की उम्र 45 वर्ष थी और वह खेती, पशुपालन और दूध बेचने का काम करता था।

शुरुआत में, ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय 3,000 रुपये प्रति माह आंकी और 14,36,694 रुपये का मुआवजा दिया। इस राशि से असंतुष्ट होकर दावेदारों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) में अपील की। हाईकोर्ट ने आय को बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रति माह माना और कुल मुआवजा 16,42,694 रुपये कर दिया।

हाईकोर्ट के आदेश से व्यथित होकर दावेदारों ने और बढ़ोतरी की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (दावेदारों) के वकील ने मुख्य रूप से दो तर्क दिए:

  1. मृतक की आयु: उन्होंने आधार कार्ड के आधार पर तर्क दिया कि मृतक की उम्र 35 वर्ष थी, न कि 45 वर्ष जैसा कि निचली अदालतों ने माना था। इसलिए, 14 की जगह 16 का गुणक (multiplier) लागू किया जाना चाहिए।
  2. आय का आकलन: यह दलील दी गई कि मृतक कृषि और संबद्ध गतिविधियों से लगभग 20,000 रुपये प्रति माह कमाता था। हाईकोर्ट द्वारा आंकी गई आय अपर्याप्त थी। इसके अलावा, यह तर्क भी दिया गया कि ‘लॉस ऑफ कंसोर्टियम’ (सान्निध्य की हानि) का लाभ सभी आश्रितों को नहीं दिया गया।

दूसरी ओर, प्रतिवादी (बीमा कंपनी) के वकील ने तर्क दिया कि दिया गया मुआवजा उचित था। उन्होंने कहा कि दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आय को और नहीं बढ़ाया जा सकता और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सबूतों के विपरीत उम्र साबित करने के लिए आधार कार्ड को निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मृतक की आयु पर: सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की उम्र के संबंध में अपीलकर्ताओं की दलील खारिज कर दी। पीठ ने दावे में एक तार्किक विसंगति की ओर इशारा किया:

“ट्रिब्यूनल के समक्ष पार्टियों के मेमो के अवलोकन से पता चलता है कि जब फरवरी 2015 में दावा याचिका दायर की गई थी, तो मृतक सालिग्राम के बेटे की उम्र 17 वर्ष दिखाई गई थी। यदि 22.11.2014 को दुर्घटना के समय मृतक की उम्र 35 वर्ष थी, तो बेटे के जन्म के समय मृतक की उम्र लगभग 18 वर्ष रही होगी। इसलिए, यह तर्क अविश्वसनीय है।”

आय के आकलन पर: कोर्ट ने मृतक की आय के संबंध में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने कहा कि अपनी जमीन पर काम करने वाले और संबद्ध गतिविधियों में लगे परिवार के सदस्य का योगदान एक वेतनभोगी कर्मचारी से काफी अलग होता है।

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस राजेश बिंदल ने कहा:

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“भले ही परिवार के स्वामित्व वाली भूमि अभी भी मौजूद हो, लेकिन परिवार के पुरुष सदस्य के योगदान का आकलन किया जाना आवश्यक है। एक कर्मचारी की तुलना में परिवार के सदस्य के योगदान की गुणवत्ता में बहुत अंतर होता है। उसके काम के घंटे निश्चित नहीं होते। कोई भी व्यक्ति जिसके पास अवसर है, वह निश्चित रूप से अपने परिवार का भरण-पोषण करने और उन्हें सुख-सुविधा में रखने के लिए जितना संभव हो सके उतना काम करने की कोशिश करता है।”

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की:

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“खेती कोई नियमित पेशा नहीं है। किसान साथ-साथ पशुपालन और दूध बेचने के काम में भी लगे रहते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय होती है।”

इस तर्क के आधार पर, कोर्ट ने तय किया कि मृतक की आय 8,000 रुपये प्रति माह मानी जानी चाहिए, जो हाईकोर्ट द्वारा तय की गई 5,000 रुपये से अधिक है।

फैसला और संशोधित गणना

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और मुआवजे में संशोधन किया। कोर्ट ने कंसोर्टियम के मुद्दे को भी संबोधित किया और बाकी तीन आश्रितों (विधवा, बेटा और बेटी) को इस मद के तहत 40,000 रुपये प्रत्येक दिए, जो कुल 1,20,000 रुपये होते हैं।

कोर्ट द्वारा स्वीकृत संशोधित गणना इस प्रकार है:

मद (Head)गणना/राशि
आश्रितता की हानि (Loss of Dependency)आय 8,000 + 40% (भविष्य की संभावनाएं) – 1/3 (कटौती) x 12 x 15 (गुणक) = 13,44,000/- रुपये
कंसोर्टियम की हानि (Loss of Consortium)40,000 रुपये x 3 आश्रित = 1,20,000/- रुपये
चिकित्सा व्यय7,32,694/- रुपये
कुल मुआवजा22,66,694/- रुपये

बढ़ी हुई राशि पर ब्याज उसी दर से मिलेगा जैसा कि हाईकोर्ट ने दावा याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान तक दिया था।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: निर्मला बाई और अन्य बनाम मानसिंह और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 248 of 2026 (Arising out of S.L.P.(C) No. 5496 of 2020)
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय विश्नोई

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