“ड्यूरा लेक्स, सेड लेक्स” | नौकरी के आवेदन में आपराधिक इतिहास छिपाने पर बाद में बरी होना बचाव नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें आपराधिक मामलों की जानकारी छुपाने के कारण रद्द की गई एक अभ्यर्थी की नियुक्ति को बहाल कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कानूनी सिद्धांत ‘ड्यूरा लेक्स, सेड लेक्स’ (Dura lex sed lex – कानून कठोर हो सकता है, लेकिन कानून कानून है) का हवाला देते हुए कहा कि सत्यापन फॉर्म में गलत जानकारी देना “प्रदर्शित दुर्भावना” (demonstrated mal-intent) को दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में बरी हो जाना या सहानुभूति का आधार, इस तरह के छिपाव (concealment) को माफ करने का कारण नहीं बन सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) द्वारा 5 मार्च 2021 को विज्ञापित ‘समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी’ की भर्ती प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ। प्रतिवादी दिनेश कुमार का चयन इस पद के लिए किया गया था।

चयन के बाद, प्रतिवादी को एक सत्यापन फॉर्म (Verification Form) और साक्ष्यांकन फॉर्म (Attestation Form) भरना था। दोनों ही फॉर्म में विशेष रूप से पूछा गया था कि क्या उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है। प्रतिवादी ने दोनों ही स्थानों पर इसका उत्तर ‘नहीं’ में दिया।

हालाँकि, संबंधित पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) द्वारा किए गए सत्यापन में यह सामने आया कि प्रतिवादी के खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे:

  1. केस क्राइम नंबर 198/2019: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 323, 504, 506 और 325 के तहत।
  2. केस क्राइम नंबर 215/2018: आईपीसी की धारा 354D और पोक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा 12 के तहत।
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इन मामलों की जानकारी मिलने के बावजूद जिला मजिस्ट्रेट ने प्रतिवादी को नियुक्ति के लिए उपयुक्त माना था। प्रतिवादी ने बाद में एक हलफनामा दायर कर मामलों की जानकारी दी और दावा किया कि उन्होंने ऐसा स्वेच्छा से किया है। लेकिन, राज्य सरकार ने तथ्यों को छुपाने के आधार पर उनकी नियुक्ति रद्द कर दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ और बाद में खंडपीठ ने प्रतिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट का मानना था कि जानकारी छुपाना ‘मामूली प्रकृति’ का था और बाद में वे बरी हो गए थे।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि सरकारी नौकरी के लिए पूर्ण और सही जानकारी देना निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास की बुनियादी आवश्यकता है।

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जानकारी छुपाने की गंभीरता पर: कोर्ट ने कहा कि जब कोई आवेदक अपने आपराधिक इतिहास को छुपाता है, तो वह नियुक्ति प्राधिकारी को उसकी उपयुक्तता का सही आकलन करने के अवसर से वंचित करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब जानकारी न देने की बात दोहराई जाती है, तो इसकी गंभीरता काफी बढ़ जाती है। यह महज एक भूल या अनजाने में की गई गलती नहीं रह जाती, बल्कि यह जानबूझकर किए गए छिपाव को दर्शाता है।”

चेतावनी (Disclaimer) का महत्व: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि फॉर्म में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि गलत जानकारी देने पर उम्मीदवार को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माना जाएगा।

“तथ्य यह है कि उसने एक बार नहीं बल्कि दो बार लंबित कार्यवाही के लिए ‘नहीं’ कहा, जो ‘प्रदर्शित दुर्भावना’ (demonstrated mal-intent) को दर्शाता है और फॉर्म में दिए गए अस्वीकरण (disclaimer) का सीधा उल्लंघन है।”

सहानुभूति और कानून: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में बरी होना या तथ्यों को स्वीकार करने का प्रयास करना, फॉर्म भरते समय किए गए झूठ को सही नहीं ठहरा सकता।

“कानून में एक कहावत है कि ‘ड्यूरा लेक्स, सेड लेक्स’ (juda lex sed lex), जिसका अर्थ है कानून कठोर हो सकता है, लेकिन कानून कानून है।”

“कानून में यह स्थिति भी स्पष्ट है कि सहानुभूति कानून का स्थान नहीं ले सकती (Sympathy cannot supplant law)। हालांकि हम स्वीकार करते हैं कि सरकारी नौकरी खोना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन साथ ही परिणामों के प्रति जागरूकता कार्यों का एक आवश्यक घटक है।”

फैसला

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को अनुमति दी और प्रतिवादी की नियुक्ति रद्द करने के आदेश को सही ठहराया।

केस विवरण

  • केस का नाम: स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य बनाम दिनेश कुमार
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 196 / 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 20292 / 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह

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