सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि ट्रायल के दौरान विश्वसनीय साक्ष्य सामने आते हैं, तो विशेष जांच दल (SIT) द्वारा दी गई “क्लीन चिट” किसी व्यक्ति को अभियुक्त के रूप में समन जारी करने से नहीं रोक सकती। कोर्ट ने कहा, “निर्दोष को दंड नहीं मिलना चाहिए, लेकिन कोई दोषी व्यक्ति भी छूटने न पाए।”
यह फैसला यदविंदर सिंह बनाम लखी उर्फ लखविंदर सिंह व अन्य [क्रिमिनल अपील संख्या ___/2025, विशेष अनुमति याचिका (क्रि.) संख्या 14822-14829/2024] में सुनाया गया, जिसमें न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र की पीठ ने फैसला सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला पंजाब के पटियाला ज़िले के पासियाना थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 50/2020 से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता यदविंदर सिंह के भाई—जो उस समय ग्राम पंचायत के सरपंच थे—की हत्या का आरोप है। एफआईआर के अनुसार, 24 लोग तीन कारों में आए और मृतक को एक वाहन से खींचकर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला।

ट्रायल कोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शियों (सूचना देने वाले और उसके भाई सहित) के बयानों के आधार पर CrPC की धारा 319 का प्रयोग करते हुए लखी उर्फ लखविंदर सिंह समेत कई निजी प्रतिवादियों को अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में समन जारी किया था। लेकिन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 18 जुलाई 2024 को इस आदेश को रद्द कर दिया [2024 SCC OnLine P&H 11673], जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।
सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों की दलीलें:
याचिकाकर्ता की ओर से (यदविंदर सिंह):
अधिवक्ता जितेश मलिक (सहायक अधिवक्ताओं अनिशा दहिया, जतिन हूडा आदि) ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के विश्वसनीय बयानों के आधार पर ठीक ही समन जारी किया था। उन्होंने कहा कि SIT की रिपोर्ट में प्रतिवादियों को क्लीन चिट देने के बावजूद ट्रायल के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं जो उन्हें अपराध से जोड़ते हैं।
मलिक ने यह भी आरोप लगाया कि SIT की जांच राजनीतिक प्रभाव में की गई, क्योंकि यह मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील था।
प्रतिवादियों की ओर से:
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (सहायक अधिवक्ताओं सौरभ सिंह चौहान, करण कपूर आदि) ने दलील दी कि CrPC की धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक और केवल ठोस एवं स्पष्ट साक्ष्य के आधार पर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने FIR में 24 लोगों के तीन कारों में आने को “असंभाव्य और अव्यावहारिक” बताया और गवाहों के बयानों में विरोधाभासों की ओर ध्यान दिलाया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय बृजेंद्र सिंह बनाम राज्य राजस्थान [(2017) 7 SCC 706] का हवाला दिया और कहा कि केवल मुख्य परीक्षा में आरोपों की पुनरावृत्ति समन जारी करने के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर जब SIT और CCTV फुटेज प्रतिवादियों को घटना-स्थल से दूर दिखाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ और निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को बहाल कर दिया और आपराधिक अपीलों को स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने कहा:
“ट्रायल एक सच्चाई को सामने लाने की प्रक्रिया है। ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत गवाही को देखते हुए, केवल SIT की रिपोर्ट के आधार पर निजी प्रतिवादियों को बरी करना न्यायहित में नहीं होगा।”
कोर्ट ने हरदीप सिंह बनाम राज्य पंजाब [(2014) 3 SCC 92] और सुखपाल सिंह खैहरा बनाम राज्य पंजाब [(2023) 1 SCC 289] जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 319 के तहत शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए, लेकिन यह मुख्य परीक्षा के चरण पर भी लागू हो सकती है।
कोर्ट ने कहा:
“न्यायालय का कर्तव्य है कि वह असली अपराधी को दंडित करे। यदि जांच एजेंसी असली अपराधी को अभियुक्त नहीं बनाती, तो न्यायालय असहाय नहीं है।”
मुख्य बिंदु:
- CrPC की धारा 319 ट्रायल के दौरान दर्ज साक्ष्य के आधार पर गैर-अभियुक्त व्यक्ति को समन करने की शक्ति देती है।
- SIT की रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं है और कोर्ट स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का मूल्यांकन कर सकती है।
- CrPC की धारा 319(4) के तहत समन किए गए व्यक्ति को पूरा अवसर मिलेगा—जैसे पुनः ट्रायल, जिरह और बचाव का अधिकार।
- कोर्ट ने कहा, “यदि हम इस स्तर पर समन को रोके, तो अन्याय अधिक होगा।”
कोर्ट के निर्देश:
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह सभी निजी प्रतिवादियों को नया समन जारी करे और यदि वे पेश नहीं होते हैं, तो कानून के अनुसार उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए।
साथ ही, कोर्ट ने पंजाब सरकार को नोटिस के बावजूद कोर्ट में उपस्थित न होने पर फटकार लगाई और कहा कि राज्य की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया में सहायता करे।
कोर्ट ने दोहराया: “कोई दोषी व्यक्ति छूटने न पाए।”
मामले का विवरण :
- मामले का शीर्षक: यदविंदर सिंह बनाम लखी उर्फ लखविंदर सिंह व अन्य
- मामला संख्या: क्रिमिनल अपील सं. ___/2025 (SLP (Crl.) सं. 14822-14829/2024 से उत्पन्न)
- पीठ: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री जितेश मलिक, सुश्री अनिशा दहिया एवं टीम
- प्रतिवादी के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गोपाल शंकरनारायणन, श्री सौरभ सिंह चौहान, श्री करण कपूर एवं अन्य