CoC की ‘कमर्शियल विजडम’ सर्वोपरि; कोर्ट आर्थिक फैसलों पर सवाल नहीं उठा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत ‘कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स’ (CoC) द्वारा लिया गया व्यावसायिक निर्णय (Commercial Wisdom) सर्वोपरि है और अदालतें वित्तीय लेनदारों के आर्थिक जोखिम के आकलन को अपनी समझ से प्रतिस्थापित नहीं कर सकती हैं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 27 फरवरी, 2026 को दिए गए अपने फैसले में एसकेएस पावर जनरेशन (छत्तीसगढ़) लिमिटेड की समाधान योजना (Resolution Plan) को चुनौती देने वाली टोरेंट पावर लिमिटेड, वांटेज पॉइंट एसेट मैनेजमेंट और जिंदल पावर लिमिटेड की अपीलों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने सारदा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड (SEML) की योजना को मंजूरी दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

एसकेएस पावर जनरेशन के खिलाफ बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया (CIRP) शुरू की गई थी। लंबी बातचीत और इंटर-से बिडिंग प्रक्रिया के बाद, CoC ने 31 मई, 2023 को अपनी 31वीं बैठक में 100% वोट शेयर के साथ SEML द्वारा प्रस्तुत समाधान योजना को स्वीकार कर लिया।

असफल बोलीदाता—टोरेंट, वांटेज और जिंदल—ने इस प्रक्रिया में ‘गंभीर अनियमितता’ का आरोप लगाते हुए इसे NCLT और फिर NCLAT में चुनौती दी। उनका दावा था कि बिडिंग खत्म होने के बाद SEML को अपनी बोली में सुधार करने की अनुमति दी गई, जो नियमों का उल्लंघन है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (असफल बोलीदाता): अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि बिडिंग की शर्तों के अनुसार 19 अप्रैल, 2023 के बाद किसी भी व्यावसायिक बदलाव की अनुमति नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि:

  • SEML को बैंक गारंटी (BG) के योगदान को ₹103.39 करोड़ से बढ़ाकर ₹180.05 करोड़ करने की छूट दी गई।
  • ₹240 करोड़ के विलंबित भुगतान (Deferred Payment) को अग्रिम भुगतान (Upfront Payment) में बदलने की अनुमति दी गई।
  • रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) द्वारा मांगे गए ये ‘स्पष्टीकरण’ वास्तव में बोली में बदलाव थे, जिससे अन्य आवेदकों के साथ भेदभाव हुआ।
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प्रतिवादी (RP, SEML और CoC): प्रतिवादियों ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि ये केवल स्पष्टीकरण थे, बदलाव नहीं। उनका पक्ष था कि:

  • SEML की मूल योजना में पहले से ही बैंक गारंटी से संबंधित ₹180.05 करोड़ की मार्जिन मनी लेनदारों को देने का प्रावधान था।
  • ₹240 करोड़ का आंकड़ा हमेशा से योजना का हिस्सा था, केवल भुगतान के विकल्प (अग्रिम या किस्तों में) को लेकर स्पष्टता मांगी गई थी।
  • CoC का निर्णय पूरी तरह से व्यावसायिक व्यवहार्यता पर आधारित था, जिसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने विस्तार से जांच की कि क्या RP द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरणों से SEML की योजना में कोई वित्तीय वृद्धि हुई थी। बैंक गारंटी के मुद्दे पर कोर्ट ने पाया कि SEML की मूल योजना के क्लॉज 6.3.14 में पहले से ही ₹180.05 करोड़ की राशि का उल्लेख था।

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पीठ ने टिप्पणी की:

“स्पष्टीकरण से पहले भी CoC को मिलने वाला भुगतान ₹180.49 करोड़ था और स्पष्टीकरण के बाद भी यही रहा। स्पष्टीकरण का उद्देश्य केवल बैंक गारंटी की वापसी तक बैंकों के अंतरिम जोखिम को समझना था।”

अग्रिम भुगतान के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि SEML ने CoC को दो विकल्प दिए थे—या तो वे ब्याज सहित ₹301.64 करोड़ भविष्य में लें या उसका वर्तमान मूल्य (NPV) ₹240 करोड़ अभी लें। यह CoC का व्यावसायिक चुनाव था, कोई नया ऑफर नहीं।

CoC की व्यावसायिक बुद्धिमत्ता और न्यायिक समीक्षा: कोर्ट ने K. Sashidhar vs. Indian Overseas Bank और Essar Steel मामलों का हवाला देते हुए दोहराया कि IBC के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित है। कोर्ट ने कहा:

“IBC यह मान्यता देता है कि मूल्यांकन और व्यवहार्यता से जुड़े निर्णय आर्थिक प्रकृति के हैं, न्यायिक नहीं। इसलिए, अदालतें CoC के मूल्यांकन के स्थान पर अपना आकलन नहीं रख सकतीं।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि RP, कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) के निर्देश पर स्पष्टीकरण मांगता है, तो उसे ‘गंभीर अनियमितता’ नहीं माना जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए NCLAT के 01.10.2024 के फैसले की पुष्टि की। कोर्ट ने नोट किया कि समाधान योजना पहले ही पूरी तरह से लागू की जा चुकी है।

अदालत ने असफल बोलीदाताओं द्वारा कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर ‘चेतावनी’ देते हुए कहा:

“यह मामला असफल समाधान आवेदकों द्वारा न्यायिक प्रणाली के रणनीतिक उपयोग का उदाहरण है… जो हर व्यावसायिक निर्णय को प्रक्रियात्मक गलती बताकर मुकदमेबाजी के जरिए दूसरा मौका पाना चाहते हैं। यह दृष्टिकोण कॉर्पोरेट देनदार के मूल्य को कम करता है और देरी को बढ़ावा देता है।”

कोर्ट ने अंत में कहा कि IBC का उद्देश्य समयबद्ध समाधान है, और न्यायिक हस्तक्षेप को केवल वैधानिक अनुपालन तक ही सीमित रहना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में ‘एग्जिट’ (Exit) की प्रक्रिया सुचारू बनी रहे।

  • केस का नाम: टोरेंट पावर लिमिटेड बनाम आशीष अर्जुनकुमार राठी और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 11746-11747/2024 (संबद्ध अपीलों के साथ)

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