कोल ब्लॉक रद्दीकरण और 2015 का अधिनियम ‘कानून में बदलाव’ के दायरे में; सुप्रीम कोर्ट ने टेपरिंग लिंकेज की कमी के मुआवजे को किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका द्वारा कोयला ब्लॉकों का रद्दीकरण और उसके बाद कोल माइंस (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 का लागू होना, बिजली खरीद समझौतों (PPA) के तहत ‘कानून में बदलाव’ (Change in Law) की श्रेणी में आता है। हालांकि, कोर्ट ने पश्चिम बंगाल राज्य बिजली वितरण कंपनी लिमिटेड (WBSEDCL) की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उस मुआवजे को रद्द कर दिया, जो बिजली उत्पादक कंपनी को कोल ब्लॉक रद्द होने से पहले ‘टेपरिंग लिंकेज’ की कमी को पूरा करने के लिए ई-नीलामी से खरीदे गए कोयले के लिए दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने कहा कि बिजली उत्पादक कंपनी (APNRL) 25 अगस्त 2014 (कोल ब्लॉक रद्द होने की तारीख) से तो ‘कानून में बदलाव’ के आधार पर मुआवजे की हकदार है, लेकिन उस तारीख से पहले अपने निजी कोयला स्रोत को चालू न कर पाने का जोखिम उसे स्वयं उठाना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 5 जनवरी 2011 को WBSEDCL और पीटीसी इंडिया लिमिटेड के बीच 100 मेगावाट बिजली की आपूर्ति के समझौते (PSA) से हुई थी। इसके बाद पीटीसी और अधुनिक पावर एंड नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (APNRL) के बीच एक बैक-टू-बैक बिजली खरीद समझौता (PPA) हुआ।

यद्यपि समझौते में कोयले के स्रोत का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था, लेकिन बैठकों के विवरण और पत्राचार से यह साफ था कि बिजली उत्पादन के लिए झारखंड के गणेशपुर कैप्टिव कोल ब्लॉक का उपयोग किया जाना था। चूंकि यह ब्लॉक समय पर चालू नहीं हो पाया, इसलिए APNRL ने ‘टेपरिंग लिंकेज’ के तहत कोयला लिया और कमी पड़ने पर ई-नीलामी और आयात के जरिए महंगा कोयला खरीदा।

25 अगस्त 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘मनोहर लाल शर्मा बनाम प्रमुख सचिव’ मामले में गणेशपुर सहित कई कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द कर दिया। इसके बाद सरकार ने नया कानून (कोल माइंस एक्ट, 2015) लागू किया। APNRL ने इसे ‘कानून में बदलाव’ बताते हुए बढ़े हुए ईंधन खर्च के लिए मुआवजे की मांग की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (WBSEDCL) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कपिल सिब्बल ने दलील दी कि PPA में गणेशपुर ब्लॉक का विशेष रूप से उल्लेख नहीं था। उन्होंने PPA की धारा 2.5 का हवाला देते हुए कहा कि यदि विक्रेता वैकल्पिक स्रोतों से कोयला खरीदता है, तो खरीदार पर इसकी कीमत बढ़ने का बोझ नहीं डाला जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि जिस ब्लॉक का अनुबंध में जिक्र ही नहीं था, उसका रद्द होना ‘कानून में बदलाव’ नहीं माना जा सकता।

उत्तरदाता (APNRL) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सी.ए. सुंदरम ने तर्क दिया कि CERC और APTEL दोनों ने सही पाया था कि गणेशपुर ब्लॉक ही बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत था। उन्होंने कहा कि ब्लॉक का रद्दीकरण PPA की धारा 10 के तहत ‘कानून में बदलाव’ है, और कंपनी को उसी आर्थिक स्थिति में वापस लाया जाना चाहिए जिसमें वह इस बदलाव के न होने पर होती।

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हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

1. कैप्टिव स्रोत की पहचान कोर्ट ने WBSEDCL के इस तर्क को खारिज कर दिया कि कोयले का स्रोत अनिश्चित था। भारतीय साक्ष्य अधिनियम का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि लिखित शर्तों के अलावा आसपास की परिस्थितियों से अनुबंध के अर्थ को समझा जा सकता है। कोर्ट ने कहा:

“वर्तमान संदर्भ में… हालांकि धारा 2.5 में कैप्टिव स्रोत की स्पष्ट पहचान नहीं की गई है, लेकिन इसकी पहचान आसपास की परिस्थितियों से स्पष्ट रूप से दिखाई देती है… WBSEDCL के लिए यह कहना सही नहीं है कि PPA/PSA ने गणेशपुर कोल ब्लॉक को बिजली उत्पादन के स्रोत के रूप में निर्धारित नहीं किया था।”

2. कानून में बदलाव बनाम क्षतिपूर्ति पीठ ने धारा 2.5 (क्षतिपूर्ति) और धारा 10 (कानून में बदलाव) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि धारा 2.5 उत्पादक को अपनी मर्जी से कहीं और से कोयला खरीदने पर उच्च दरें मांगने से रोकती है, जबकि धारा 10 तब लागू होती है जब कोई कानूनी बदलाव स्रोत के संचालन के अधिकार को प्रभावित करता है।

अदालत ने कहा कि ‘मनोहर लाल शर्मा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या, जिसके कारण कोयला ब्लॉकों का आवंटन रद्द हुआ, स्पष्ट रूप से धारा 10.1.1(b) और 10.1.1(f) के तहत ‘कानून में बदलाव’ की श्रेणी में आता है। इससे APNRL का कोयला प्राप्त करने का अधिकार भौतिक रूप से प्रभावित हुआ।

3. टेपरिंग लिंकेज की कमी पर निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने टेपरिंग लिंकेज की कमी को पूरा करने के लिए दिए गए मुआवजे पर APTEL के नजरिए से असहमति जताई। कोर्ट ने पाया कि APNRL ने आश्वासन दिया था कि बिजली आपूर्ति शुरू होने तक कोयला ब्लॉक चालू हो जाएगा। ब्लॉक को चालू करने में देरी के लिए WBSEDCL को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि धारा 2.5 का उद्देश्य खरीदार (WBSEDCL) को कोयले की कीमतों में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि से बचाना था। ‘कानून में बदलाव’ की घटना से पहले कोयले की कमी के कारण हुआ अतिरिक्त खर्च उत्पादक को स्वयं वहन करना होगा।

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कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया और निम्नलिखित निष्कर्ष दिए:

  • रद्दीकरण के बाद का मुआवजा बरकरार: 25 अगस्त 2014 से ‘कानून में बदलाव’ के कारण होने वाले अतिरिक्त खर्च के लिए APNRL मुआवजे और वहन लागत (carrying costs) की हकदार है।
  • रद्दीकरण से पहले का दावा खारिज: कोल ब्लॉक रद्द होने से पहले टेपरिंग लिंकेज की कमी को पूरा करने के लिए किए गए खर्च का कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा।
  • CERC को निर्देश: अदालत ने CERC को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर अपने कार्यान्वयन आदेश (consequential order) में आवश्यक संशोधन करे।
  • केस का नाम: वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड बनाम अधुनिक पावर एंड नेचुरल रिसोर्स लिमिटेड और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2584-2585/2026

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