जमानत याचिकाकर्ता SLP की सिनॉप्सिस में बताएं आपराधिक इतिहास, गलत जानकारी देने पर याचिका खारिज हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट


भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को मज़बूती देने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक आरोपी की जमानत याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि उसने अपने आपराधिक इतिहास को विशेष अनुमति याचिका (SLP) की सिनॉप्सिस में उजागर नहीं किया। साथ ही, अदालत ने यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब से हर जमानत याचिकाकर्ता को SLP की शुरुआत में ही अपने आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी देनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मुन्नेश को 26 मई 2018 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दर्ज एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। मामले का ट्रायल अभी चल रहा है और अब तक अभियोजन पक्ष द्वारा 22 में से 8 गवाहों की गवाही हो चुकी है।

पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद, उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की।

Video thumbnail

महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना

SLP की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का कोई ज़िक्र नहीं किया था। राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे में यह खुलासा हुआ कि मुन्नेश के खिलाफ आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से कुछ में पूर्व में दोषसिद्धि भी हुई है – विशेष रूप से IPC की धारा 379 और 411 के तहत।

READ ALSO  शादी के वादे पर रेप के आरोपी को कोर्ट ने किया बरी- जानिए विस्तार से

जब कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह चूक पैरोकार (जानकारी देने वाले) द्वारा अधूरी सूचना देने के कारण हुई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को अस्वीकार्य बताया और इस तरह की जानकारी छिपाने को गंभीर मुद्दा माना।

कोर्ट ने टिप्पणी की –


“यदि याचिकाकर्ता का आपराधिक इतिहास SLP में बताया गया होता, तो शायद इस याचिका पर नोटिस ही जारी नहीं किया जाता।”

कोर्ट का निर्णय और टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने मुन्नेश की जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा:

  • “महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाना याचिकाकर्ता को न्यायिक विवेकाधीन राहत (जैसे कि जमानत) पाने से वंचित कर देता है।”
  • “याचिका के गुण-दोष पर भी कोई मजबूत आधार नहीं था, क्योंकि ट्रायल प्रगति पर है और महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही हो चुकी है।”
READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के प्रयास जारी रखने का आदेश दिया

मामले का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह अनिवार्य आदेश दिया कि भविष्य में धारा 438/439 CrPC या धारा 482/483 BNSS के तहत दाखिल होने वाली हर जमानत याचिका में याचिकाकर्ता को यह स्पष्ट रूप से लिखना होगा:

“SLP की ‘सिनॉप्सिस’ में यह अनिवार्य रूप से बताया जाए कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, या यदि उसे किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की जानकारी है, तो वह उसका उल्लेख स्पष्ट रूप से करे और यह भी बताए कि मामला किस चरण में है।”

साथ ही, कोर्ट ने चेतावनी दी कि:

“यदि बाद में यह पाया गया कि दी गई जानकारी गलत थी, तो उसी आधार पर SLP को खारिज किया जा सकता है।”

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जमानत याचिकाओं में जानकारी छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, और यह सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग है:

“देश की सर्वोच्च अदालत के साथ धोखा नहीं किया जा सकता। अब समय आ गया है कि इस स्थिति को और न बढ़ने दिया जाए।”

READ ALSO  मद्रास हाईकोर्ट ने अखिल राज्य जनहित याचिकाओं की सुनवाई के लिए अपनी मदुरै पीठ की शक्ति बहाल कर दी

कोर्ट ने अपने पुराने आदेशों का भी हवाला दिया –
13 अक्टूबर 2023 को कुलविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य और
19 अक्टूबर 2023 को शेख भोला बनाम बिहार राज्य,
जिनमें पारदर्शिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उन आदेशों का पर्याप्त पालन न होने के कारण अब यह बाध्यकारी आदेश दिया गया है।

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: मुन्नेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • SLP (Crl.) संख्या: 1400 / 2025
  • निर्णय की तिथि: 3 अप्रैल 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री आयुष नेगी (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड), श्रीमती विशाखा उपाध्याय और श्रीमती आरुषि गुप्ता के साथ
  • उत्तरदाता (राज्य) के वकील: श्री सर्वेश सिंह बघेल (AOR)
  • चुनौती दिया गया आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश दिनांक 03.10.2023 (CRMBA संख्या 38065 / 2023)

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles