सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल मनोहर लाल की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए कहा है कि केवल अनुमान या आशंका के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि विभागीय जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत नियमित विभागीय जांच से छूट देने की असाधारण शक्ति तभी प्रयोग की जा सकती है जब उसके समर्थन में ठोस सामग्री मौजूद हो।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने 12 मार्च 2026 को दिए अपने निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और विभागीय अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने कांस्टेबल को सेवा में पुनः बहाल करने, सेवा की निरंतरता प्रदान करने और बर्खास्तगी की अवधि के लिए 50 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा कि विभाग चाहे तो विधि के अनुसार नियमित विभागीय जांच प्रारंभ कर सकता है।
मामला क्या था
मामले की शुरुआत 28 जून 2017 को दर्ज एफआईआर संख्या 390/2017 से हुई थी। इसके बाद मनोहर लाल को 29 जून 2017 को हिरासत में लिया गया था।
दिल्ली पुलिस के उप पुलिस आयुक्त ने 18 जुलाई 2017 को अनुच्छेद 311(2) के दूसरे प्रावधान की धारा (b) का सहारा लेते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। आदेश में कहा गया कि परिस्थितियों को देखते हुए विभागीय जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है क्योंकि गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका है।
बर्खास्तगी के खिलाफ दायर अपील को 30 जुलाई 2018 को खारिज कर दिया गया। बाद में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 29 नवंबर 2022 को याचिका खारिज कर दी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता की दलील
सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 और दिल्ली पुलिस (दंड एवं अपील) नियम, 1980 के अनुसार बर्खास्तगी एक गंभीर दंड है और इसे सामान्यतः नियमित विभागीय जांच के बाद ही दिया जा सकता है।
यह भी तर्क दिया गया कि जिस समय बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया, उस समय याचिकाकर्ता हिरासत में था। ऐसे में गवाहों को डराने या प्रभावित करने की आशंका का कोई ठोस आधार नहीं था।
राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और गवाह घटना से भयभीत थे। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता के आपराधिक तत्वों से कथित संबंध और उसके पुलिस पद के कारण यह संभावना थी कि वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 311(2)(b) का प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी को यह दर्ज करना होता है कि नियमित विभागीय जांच करना वास्तव में “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है और यह निष्कर्ष ठोस सामग्री पर आधारित होना चाहिए।
कोर्ट ने संविधान पीठ के फैसले Union of India बनाम तुलसीराम पटेल का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान का उपयोग हल्के में या मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।
प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने प्रारंभिक जांच रिपोर्ट का परीक्षण किया और पाया कि जिन गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे, उनमें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि याचिकाकर्ता ने उन्हें धमकाया या डराया था।
इस संदर्भ में कोर्ट ने कहा:
“रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह दर्शाया जा सके कि अपीलकर्ता या उसके सहयोगियों का आपराधिक तत्वों से ऐसा संबंध था जिसके आधार पर यह माना जा सके कि वे शिकायतकर्ता या गवाहों को धमका सकते थे, डराने का प्रयास कर सकते थे या उन्हें मुकदमे से पीछे हटने के लिए प्रेरित कर सकते थे।”
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि बर्खास्तगी का आदेश उस समय पारित किया गया जब याचिकाकर्ता हिरासत में था। ऐसी स्थिति में विभाग को यह दिखाना चाहिए था कि हिरासत में रहते हुए भी वह गवाहों को प्रभावित कर सकता था, जबकि ऐसा कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर नहीं था।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल अनुमान या विश्वास के आधार पर नियमित प्रक्रिया से हटकर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
“केवल विश्वास या अनुमान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि नियमित विभागीय जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।”
अदालत ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने मामले में उचित विचार नहीं किया।
“विभागीय जांच को समाप्त करने का आदेश उचित विचार के बिना पारित किया गया है और इसे कायम नहीं रखा जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विभागीय जांच से छूट देने का निर्णय ठोस सामग्री के बिना लिया गया था और इसलिए यह मनमाना है। अदालत ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए कांस्टेबल को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि विभाग चाहे तो विधि के अनुसार नियमित विभागीय जांच शुरू कर सकता है।
प्रकरण विवरण
मामला: मनोहर लाल बनाम पुलिस आयुक्त एवं अन्य
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
मामला संख्या: सिविल अपील संख्या 13860 / 2024
पीठ: न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर
निर्णय की तिथि: 12 मार्च 2026

