IO के सवालों का जवाब न देना ‘अपने आप में’ असहयोग नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि जांच अधिकारी (IO) के सवालों का जवाब न देना स्वतः ही जांच में असहयोग नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही, अदालत ने जमानत याचिका खारिज करने वाले हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, शैली महंत उर्फ संदीप को 2025 की एफआईआर संख्या 166 में बीएनएस, 2023 की धारा 329(1), 329(4), 62, 351(3), 305 और 190 के तहत आरोपी बनाया गया है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि अपीलकर्ता ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता के घर में घुसपैठ की और वहां रखा सामान चुरा लिया। शिकायतकर्ता का दावा है कि 6 अगस्त, 2025 के बिक्री समझौते (Agreement to Sell) के आधार पर उक्त घर उसके कब्जे में है।

निचली अदालत और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट दोनों ने अपीलकर्ता की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 8 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया और अपीलकर्ता को जांच में सहयोग करने की शर्त पर किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत प्रदान की थी।

पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान, पंजाब राज्य के वकील ने निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया कि अदालत के अंतरिम संरक्षण आदेश के बाद अपीलकर्ता जांच अधिकारी (IO) के सामने पेश हुआ था। हालांकि, राज्य की दलील थी कि अपीलकर्ता “जांच में पूरी तरह से सहयोग नहीं कर रहा है।”

अदालत का विश्लेषण

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की दो-सदस्यीय पीठ ने पूछताछ के दौरान अपीलकर्ता के कथित असहयोग को लेकर राज्य की दलीलों का परीक्षण किया।

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पीठ ने इस धारणा को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया कि चुप रहना अनिवार्य रूप से जांच में बाधा डालना है। अदालत ने टिप्पणी की:

“IO के सवालों का जवाब न देने का मतलब स्वतः ही यह नहीं होगा कि असहयोग किया जा रहा है।”

अदालत ने कहा कि वह इस पहलू पर आगे विचार नहीं करना चाहती, लेकिन उसने तीन महत्वपूर्ण कारकों पर गौर किया जो अपीलकर्ता के पक्ष में थे:

  1. अंतरिम राहत मिलने के बाद अपीलकर्ता IO के सामने पेश हुआ।
  2. अचल संपत्ति को लेकर पक्षों के बीच “दीवानी विवाद (civil dispute)” है।
  3. मामले के अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
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निर्णय

अपने विश्लेषण के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला: “…हमारा सुविचारित मत है कि अपीलकर्ता भी अग्रिम जमानत पर रिहा होने का हकदार है।”

अदालत ने अपील स्वीकार कर ली और जमानत खारिज करने वाले विवादित आदेश को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता को क्षेत्राधिकार वाले IO द्वारा तय की गई शर्तों पर अग्रिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया। इसके अलावा, अदालत ने एक सख्त शर्त लगाई कि अपीलकर्ता “किसी विशेष कारण से छूट मिलने के अलावा सुनवाई की सभी तारीखों पर निचली अदालत में पेश होगा।”

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: शैली महंत उर्फ संदीप बनाम पंजाब राज्य
  • केस नंबर: 2026 की आपराधिक अपील संख्या (@SLP(CRL.) NO.20 OF 2026)
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले

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