सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश में नकली शराब बनाने के रैकेट में शामिल होने के आरोपी व्यवसायी मनोज कुमार मुट्टा को अग्रिम जमानत प्रदान की है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता को गिरफ्तारी से सुरक्षा देने से इनकार कर दिया गया था।
यह कानूनी मामला मुख्य रूप से इस प्रश्न पर आधारित था कि क्या अपीलकर्ता अपराध संख्या 171/2025 के संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत प्रासंगिक) के तहत अग्रिम जमानत का हकदार है। अदालत ने पाया कि चूंकि अपीलकर्ता का नाम प्रारंभिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में नहीं था, उसके परिसर में कोई छापेमारी नहीं की गई थी, और उसने अंतरिम सुरक्षा के दौरान जांच में पूरा सहयोग किया था, इसलिए उसे अग्रिम जमानत देना न्यायोचित है।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत 6 अक्टूबर, 2025 को आबकारी अधिकारियों द्वारा इब्राहिमपट्टनम में अड्डपल्ली जगन मोहन राव (आरोपी नंबर 2) की दुकान और एक गोदाम पर की गई छापेमारी से हुई थी। इस दौरान 7,800 बोतल नकली शराब, 3,325 लीटर मिश्रण और बॉटलिंग मशीनरी जब्त की गई थी। इसके बाद ‘ए.एन.आर. रेस्टोरेंट एंड बार’ में की गई छापेमारी में ‘ओल्ड एडमिरल ब्रांडी’ और ‘केरल माल्ट व्हिस्की’ जैसे ब्रांडों की नकली शराब बनाने के उपकरण मिले थे।
विजयवाड़ा में बोतलों के थोक व्यापारी अपीलकर्ता को बाद में आरोपी नंबर 1 और 2 की हिरासत में पूछताछ के बाद मामले में शामिल किया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलकर्ता ने बॉटलिंग यूनिट के लिए आवश्यक प्लास्टिक की बोतलें और ढक्कन (कैप) की आपूर्ति की थी। इसके आधार पर, 30 अक्टूबर, 2025 के एक मेमो के माध्यम से उसे एफआईआर में आरोपी नंबर 20 के रूप में जोड़ा गया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री के. परमेश्वर ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता शुरू में एफआईआर में नामजद नहीं था और उसकी पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता के व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर कोई छापेमारी नहीं हुई थी और न ही उसका ए.एन.आर. रेस्टोरेंट एंड बार से कोई संबंध है। यह भी प्रस्तुत किया गया कि 6 जनवरी, 2026 को मिली अंतरिम सुरक्षा के बाद अपीलकर्ता कई बार जांच अधिकारी के समक्ष पेश हुआ और जांच में पूर्ण सहयोग किया।
राज्य की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) श्री एस.वी. राजू ने याचिका का विरोध करते हुए इसे नकली शराब के उत्पादन का एक गंभीर मामला बताया। उन्होंने तर्क दिया कि गवाहों ने अपीलकर्ता की पहचान उन बोतलों और ढक्कनों के आपूर्तिकर्ता के रूप में की है जिन पर सरकारी लेबल लगे थे। राज्य का तर्क था कि राज्य में नकली शराब के निर्माण और आपूर्ति से जुड़ी “बड़ी साजिश और मनी ट्रेल” का पता लगाने के लिए अपीलकर्ता की हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता का नाम केवल जांच के दौरान और अभियोजन पक्ष द्वारा बाद में दाखिल किए गए मेमो में सामने आया। पीठ ने उल्लेख किया कि 6 अक्टूबर, 2025 की छापेमारी उन परिसरों में की गई थी जो “अपीलकर्ता के नहीं हैं।”
अदालत ने अंतरिम सुरक्षा की अवधि के दौरान अपीलकर्ता के आचरण पर विशेष जोर दिया:
“वर्तमान मामले में, इस न्यायालय द्वारा 6.1.2026 के आदेश के माध्यम से उसे गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की गई थी और वह जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ है। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अपीलकर्ता ने दी गई स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।”
राज्य द्वारा अपीलकर्ता के विरुद्ध पिछले आपराधिक मामलों का हवाला दिए जाने पर, अदालत ने नोट किया कि उन मामलों में उसे गिरफ्तार किया गया था और जमानत पर रिहा कर दिया गया था, और वर्तमान आरोपों को अभी मुकदमे के माध्यम से सिद्ध किया जाना बाकी है।
अदालत का निर्णय
अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा को स्थायी (Absolute) कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया:
“गिरफ्तारी की स्थिति में, अपीलकर्ता को अपराध संख्या 171/2025 के संबंध में अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाएगा… उन नियमों और शर्तों पर जो गिरफ्तार करने वाले अधिकारी या ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए जा सकते हैं, इस अतिरिक्त शर्त के साथ कि अपीलकर्ता हमेशा जांच और मुकदमे के दौरान सहयोग करेगा और गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा।”
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: मनोज कुमार मुट्टा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1263/2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 20419/2025 से उत्पन्न)
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
- आदेश की तिथि: 10 मार्च, 2026

