वायु प्रदूषण पर नई जनहित याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ता को एम.सी. मेहता केस में हस्तक्षेप की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने वाली एक नई जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने वेलनेस विशेषज्ञ और होलिस्टिक हेल्थ कोच ल्यूक क्रिस्टोफर कुटिन्हो को अपनी याचिका वापस लेने और पहले से लंबित एम.सी. मेहता मामले में इंटरवेंशन एप्लिकेशन दाखिल करने की अनुमति दे दी।

मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अगुआई वाली पीठ ने कहा कि प्रदूषण पर मुख्य मामला पहले से लंबित है और बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

मुख्य न्यायाधीश ने आदेश में दर्ज किया, “याचिकाकर्ता लंबित एम.सी. मेहता मामले में हस्तक्षेप के लिए यह याचिका वापस लेना चाहता है।”

कुटिन्हो ने 24 अक्टूबर को यह याचिका दाखिल की थी। इसमें केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM), कई केंद्रीय मंत्रालय, नीति आयोग और दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सरकारों को पक्षकार बनाया गया था।

याचिका में दावा किया गया कि देश में वायु प्रदूषण का स्तर अब “जनस्वास्थ्य आपात स्थिति” का रूप ले चुका है और यह नागरिकों के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने अदालत से वायु प्रदूषण को राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित करने और सख्त व समयबद्ध राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश देने की मांग की।

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याचिका में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की प्रगति पर गंभीर सवाल उठाए गए। NCAP ने 2019 में 2024 तक पार्टिकुलेट मैटर में 20–30 प्रतिशत कमी का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में 2026 तक 40 प्रतिशत कमी के लक्ष्य में बदला गया। याचिका में कहा गया कि ये “साधारण लक्ष्य भी पूरे नहीं हुए”।

याचिकाकर्ता के अनुसार, जुलाई 2025 तक 130 नामित शहरों में से केवल 25 शहर ही 2017 के आधार स्तर की तुलना में PM₁₀ में 40 प्रतिशत की कमी ला पाए हैं, जबकि 25 शहरों में प्रदूषण बढ़ गया है। कोलकाता, लखनऊ और कई अन्य शहरों के लिए भी यही स्थिति बताई गई।

याचिका में NCAP के लक्ष्यों को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने, स्पष्ट समय-सीमा, मापनीय संकेतकों और अनुपालन न करने पर दंड का प्रावधान करने की मांग की गई थी।

कुटिन्हो की याचिका में यह भी दावा किया गया कि दिल्ली में ही 22 लाख स्कूली बच्चे वायु प्रदूषण के कारण अपरिवर्तनीय फेफड़ों की क्षति झेल चुके हैं, जैसा कि सरकारी और चिकित्सीय अध्ययनों में सामने आया है।

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याचिका में देश की वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली को भी अपर्याप्त बताया गया और एक स्वतंत्र पर्यावरण स्वास्थ्य विशेषज्ञ की अध्यक्षता में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता एवं जनस्वास्थ्य टास्क फोर्स गठित करने की मांग की गई।

कुटिन्हो ने पराली जलाने पर तत्काल रोक लगाने, किसानों को प्रोत्साहन देने, उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाने, ई-मोबिलिटी और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की भी मांग की।

याचिका में उद्योगों के उत्सर्जन मानकों को रियल-टाइम मॉनिटरिंग के साथ सख्ती से लागू करने और डेटा को सार्वजनिक करने का अनुरोध किया गया था।

याचिका अब औपचारिक रूप से वापस ले ली गई है, और याचिकाकर्ता अब लंबित एम.सी. मेहता प्रदूषण मामले में हस्तक्षेप याचिका दाखिल करेंगे, जहां इन मुद्दों पर व्यापक रूप से विचार किया जा सकता है।

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