शो-कॉज नोटिस खारिज किया जा सकता है यदि बुनियादी तथ्य ही धराशायी हो जाएं; सुप्रीम कोर्ट ने FEMA कार्यवाही को रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था में कहा है कि यदि किसी मामले में ‘विश्वास करने योग्य कारण’ (reason to believe) जैसा बुनियादी आधार ही मौजूद न हो, तो शो-कॉज नोटिस (SCN) के स्तर पर भी कानूनी हस्तक्षेप किया जा सकता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले और एक अंतिम एडजुडिकेशन ऑर्डर (न्यायनिर्णयन आदेश) को रद्द करते हुए कहा कि जब सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) ही आरोपों के आधार को अपर्याप्त मान चुका हो, तो एडजुडिकैटिंग अथॉरिटी कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ा सकती।

मामले का मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 के तहत जारी शो-कॉज नोटिस तब भी प्रभावी रह सकता है, जब सक्षम प्राधिकारी ने स्पष्ट रूप से यह दर्ज किया हो कि उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट द्वारा शो-कॉज नोटिस को दी गई चुनौती को खारिज करना गलत था। कोर्ट ने एडजुडिकेशन ऑर्डर को “मनमाना और कानून के विरुद्ध” करार दिया और पूरी कार्यवाही को वापस शो-कॉज नोटिस के स्तर पर भेज दिया है, जो अब जब्ती की वैधता पर अपीलीय निर्णय के बाद ही शुरू होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मैसर्स एकॉर्ड डिस्टिलरीज एंड ब्रुअरीज प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों (अपीलकर्ताओं) से जुड़ा है। उन पर आरोप था कि उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अनुमति के बिना सिंगापुर की एक इकाई, मैसर्स सिल्वर पार्क इंटरनेशनल पीटीई लिमिटेड के 70 लाख शेयर हासिल किए। इन आरोपों के बाद, प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकृत अधिकारी ने FEMA की धारा 37A(1) के तहत अपीलकर्ताओं की संपत्तियां जब्त कर ली थीं।

हालांकि, 3 फरवरी 2021 को सक्षम प्राधिकारी ने इस जब्ती की पुष्टि करने से इनकार कर दिया। प्राधिकारी ने अपने आदेश में कहा:

“प्रवर्तन निदेशालय यह साबित करने में विफल रहा है कि ‘सब्सक्राइब किए गए शेयरों’ के लिए किसी भी धन का भुगतान ‘कानूनी या अवैध’ रूप से किया गया था… इस मामले में सिंगापुर में किसी भी मूल्य का कोई शेयर धारित नहीं था। इसलिए संदेह का कोई आधार नहीं है।”

इस निष्कर्ष के बावजूद, निदेशालय ने शो-कॉज नोटिस जारी रखा और 26 अगस्त 2024 को एक अंतिम आदेश पारित कर दिया, जिसमें जुर्माना और संपत्ति की कुर्की का निर्देश दिया गया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ लूथरा और श्री हारिन पी. रावल ने तर्क दिया कि एक बार जब सक्षम प्राधिकारी ने जब्ती का कोई आधार नहीं पाया, तो शो-कॉज नोटिस के “बुनियादी तथ्य” (foundational facts) समाप्त हो गए। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने यह मानकर गलती की कि शो-कॉज नोटिस के खिलाफ रिट याचिका विचारणीय नहीं है, विशेषकर तब जब नोटिस का क्षेत्राधिकार ही खत्म हो चुका हो।

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उत्तरदाताओं (ED) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री अनिल कौशिक ने दलील दी कि धारा 37A के तहत जब्ती की कार्यवाही और धारा 16 के तहत न्यायनिर्णयन (adjudication) की कार्यवाही एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। उनका दावा था कि एडजुडिकैटिंग अथॉरिटी के पास सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्षों के बावजूद मामले को मेरिट पर तय करने का स्वतंत्र अधिकार है।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अदालतें आमतौर पर शो-कॉज नोटिस के स्तर पर दखल नहीं देती हैं, लेकिन यह कोई “अकाट्य नियम” नहीं है। यूनियन ऑफ इंडिया बनाम विको लेबोरेटरीज (2007) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि नोटिस क्षेत्राधिकार के बिना या कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में जारी किया गया है, तो हस्तक्षेप अनिवार्य है।

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खंडपीठ ने पाया कि जब्ती की पुष्टि न करना एक ठोस निष्कर्ष था कि ‘विश्वास करने का कारण’ अनुपस्थित था। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब्ती की पुष्टि करने से इनकार करना यह दर्शाता है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर ‘विश्वास करने के कारण’ की बुनियादी आवश्यकता पूरी नहीं हुई थी।”

अदालत ने यह भी पाया कि एडजुडिकैटिंग अथॉरिटी ने सक्षम प्राधिकारी के आदेश को उस समय ‘उलट’ दिया जब मामला अभी अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष विचाराधीन था। कोर्ट ने कहा:

“इस तरह की कार्यप्रणाली अपीलीय प्राधिकारी की शक्तियों को हथियाने के समान है, वह भी तब जब सक्षम प्राधिकारी का आदेश विभाग की अपील के कारण अभी विचाराधीन है।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेशों और 26 अगस्त 2024 के अंतिम एडजुडिकेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया है।

कोर्ट के निर्देश:

  1. अपीलीय प्राधिकारी को दो महीने के भीतर विभाग की उस अपील पर फैसला करना होगा, जो सक्षम प्राधिकारी के जब्ती न करने के आदेश के खिलाफ है।
  2. शो-कॉज नोटिस से जुड़ी कार्यवाही फिर से शुरू मानी जाएगी, लेकिन यह अपीलीय प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही आगे बढ़ेगी।
  3. इस कार्यवाही को हाईकोर्ट या एडजुडिकैटिंग अथॉरिटी की पिछली टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाया जाएगा।
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केस विवरण ब्लॉक:

  • केस टाइटल: जे. श्री निशा बनाम स्पेशल डायरेक्टर, एडजुडिकैटिंग अथॉरिटी, प्रवर्तन निदेशालय एवं अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 23415 of 2025 से उत्पन्न)
  • बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • तारीख: 01 अप्रैल, 2026

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