मध्यस्थता कार्यवाही में हर दावे के लिए धारा 21 का नोटिस अनिवार्य नहीं; प्रतिवादी के आचरण से भी तय हो सकता है रिफरेंस का दायरा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (A&C Act) की धारा 21 के तहत विशिष्ट विवादों के लिए नोटिस जारी न करना किसी पक्ष को मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के समक्ष दावे उठाने से नहीं रोकता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि एक बार जब ट्रिब्यूनल का गठन हो जाता है, तो संदर्भ (Reference) का दायरा मध्यस्थता समझौते और अधिनियम की धारा 23 द्वारा निर्धारित किया जाता है, न कि केवल शुरुआत में दिए गए ‘इन्वोकेशन नोटिस’ द्वारा। यह तब और अधिक लागू होता है जब मध्यस्थता क्लॉज का दायरा व्यापक हो।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि धारा 21 का उद्देश्य केवल परिसीमा (limitation) के लिए कार्यवाही शुरू होने की तारीख निर्धारित करना है और यह ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित नहीं करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने मेसर्स भगीरथ इंजीनियरिंग लिमिटेड द्वारा केरल राज्य के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार कर लिया। मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या एक मध्यस्थता न्यायाधिकरण, जिसे प्रतिवादी (राज्य) के अनुरोध पर एक विशिष्ट विवाद को निपटाने के लिए नियुक्त किया गया था, वह अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए अतिरिक्त विवादों पर फैसला दे सकता है, जिनके लिए अलग से धारा 21 का नोटिस नहीं दिया गया था।

केरल हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवार्ड को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ट्रिब्यूनल ने उन विवादों (संख्या 2 से 4) पर फैसला देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है, जिन्हें राज्य द्वारा संदर्भित नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और 29 जून 2006 के मध्यस्थता अवार्ड को बहाल कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, मेसर्स भगीरथ इंजीनियरिंग लिमिटेड को विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित केरल राज्य परिवहन परियोजना (KSTP) के तहत सड़क रखरखाव के चार अनुबंध दिए गए थे। अनुबंध की सामान्य शर्तों (GCC) में विवाद समाधान के लिए एक बहु-स्तरीय तंत्र प्रदान किया गया था:

  1. इंजीनियर के निर्णय के 14 दिनों के भीतर न्यायनिर्णायक (Adjudicator) के पास जाना।
  2. एडजुडिकेटर को 28 दिनों के भीतर निर्णय देना था।
  3. कोई भी पक्ष एडजुडिकेटर के निर्णय को 28 दिनों के भीतर मध्यस्थ (Arbitrator) के पास भेज सकता था।
  4. यदि 28 दिनों के भीतर इसे संदर्भित नहीं किया जाता, तो एडजुडिकेटर का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता।
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भुगतान और मूल्य समायोजन को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। 14 अगस्त 2004 को एडजुडिकेटर ने चार विवादों पर फैसला सुनाया: विवाद संख्या 1 और 3 पर अपीलकर्ता के पक्ष में, और विवाद संख्या 2 और 4 पर उनके खिलाफ।

1 अक्टूबर 2004 को—28-दिवसीय सीमा अवधि समाप्त होने के बाद—प्रतिवादी (राज्य) ने अपीलकर्ता को सूचित किया कि विवाद संख्या 1 पर एडजुडिकेटर का फैसला स्वीकार्य नहीं है और वे मामले को मध्यस्थता के लिए भेजना चाहते हैं। अपीलकर्ता ने ट्रिब्यूनल के गठन पर सहमति जताई लेकिन सभी चार विवादों को उठाने का अधिकार सुरक्षित रखा।

11 जनवरी 2005 को गठित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने सभी चार मुद्दों पर अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। जिला न्यायाधीश ने धारा 34 के तहत इस अवार्ड को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि संदर्भ समय-बाधित (time-barred) था। अपील पर, केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अवार्ड को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन अलग आधार पर: कि ट्रिब्यूनल केवल विवाद संख्या 1 के लिए नियुक्त किया गया था और अपीलकर्ता ने शेष विवादों के लिए धारा 21 का नोटिस जारी नहीं किया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता का तर्क: अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राजीव शकधर ने तर्क दिया कि मध्यस्थता क्लॉज व्यापक था, जिसमें “कोई भी विवाद या अंतर” शामिल था। उन्होंने कहा कि समझौता केवल एडजुडिकेटर द्वारा संदर्भित विशिष्ट विवाद तक सीमित नहीं था। यह तर्क दिया गया कि धारा 21 “जब तक पक्षों द्वारा अन्यथा सहमति न हो” (Unless otherwise agreed by the parties) वाक्यांश से शुरू होती है, और यहाँ अनुबंध में एक विशिष्ट तंत्र था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिवादी के आचरण ने प्रक्रियात्मक आपत्तियों को समाप्त कर दिया था और हर दावे के लिए अलग धारा 21 नोटिस की आवश्यकता से कई मध्यस्थता कार्यवाहियां शुरू हो जाएंगी।

प्रतिवादी का तर्क: राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नवीन आर. नाथ ने तर्क दिया कि विवाद समाधान तंत्र में वैधानिक महत्व के चरण शामिल थे। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल विशेष रूप से राज्य के अनुरोध पर विवाद संख्या 1 के लिए नियुक्त किया गया था। यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता उन विवादों के लिए “क्लेमेंट” (दावेदार) नहीं हो सकता जिन्हें उसने कभी औपचारिक रूप से धारा 21 नोटिस के माध्यम से शुरू नहीं किया था।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों के आचरण और A&C अधिनियम की वैधानिक व्याख्या पर ध्यान केंद्रित करते हुए हाईकोर्ट के तर्क को खारिज कर दिया।

1. प्रतिवादी का आचरण प्रक्रियात्मक आपत्तियों को रोकता है कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी ने स्वयं अनुबंध की समयसीमा का उल्लंघन किया था, क्योंकि उन्होंने 28 दिनों की सीमा के बावजूद एडजुडिकेटर के निर्णय के 56 दिन बाद मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा था। कोर्ट ने नोट किया कि प्रतिवादी ने ट्रिब्यूनल के समक्ष एडजुडिकेटर के पूरे निर्णय को “शून्य और अमान्य” घोषित करने की मांग की थी, जिससे सभी विवादों का रास्ता खुल गया।

एम.के. शाह इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1999) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि कोई पक्ष अपनी गलती का लाभ नहीं उठा सकता।

2. A&C अधिनियम की धारा 21 का उद्देश्य कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 21 मुख्य रूप से परिसीमा (limitation) की गणना के लिए है और यह ट्रिब्यूनल के गठित होने के बाद अतिरिक्त दावे उठाने से रोकने वाली कोई अधिकार-क्षेत्रीय बाधा नहीं है।

एएसएफ बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम शापूरजी पलोनजी एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (2025) का संदर्भ देते हुए, कोर्ट ने नोट किया कि “विशिष्ट विवाद” शब्द का अर्थ सभी विवाद नहीं है, न ही यह मध्यस्थता न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र को केवल नोटिस में उल्लिखित विवादों तक सीमित करता है।

कोर्ट ने अदाव्या प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम विशाल स्ट्रक्चरल्स प्राइवेट लिमिटेड (2025) पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि “धारा 21 नोटिस में कुछ विवादों को शामिल न करना दावेदार को मध्यस्थता के दौरान उन्हें उठाने से नहीं रोकता है, जब तक कि वे मध्यस्थता समझौते के तहत आते हैं।”

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3. संदर्भ का दायरा और धारा 23 पीठ ने रेखांकित किया कि अनुबंध का क्लॉज 25.3 व्यापक शब्दों में था जिसमें “कोई भी विवाद या अंतर” शामिल था। स्टेट ऑफ गोवा बनाम प्रवीण एंटरप्राइजेज (2012) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने समझाया कि जब तक मध्यस्थता समझौता विशेष रूप से मध्यस्थ को केवल संदर्भित विवादों का निर्णय लेने के लिए प्रतिबंधित नहीं करता है, तब तक पक्ष धारा 23 के तहत हर नए दावे के लिए पूर्व नोटिस के बिना दावे और प्रति-दावे (counter-claims) दायर करने के हकदार हैं।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अवार्ड को रद्द करके गलती की। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं किया था।

न्यायालय ने कहा:

“उपरोक्त कारणों से, हम मध्यस्थता अपील संख्या 56/2012 में केरल हाईकोर्ट, एर्नाकुलम के 07.01.2025 के फैसले को रद्द करते हैं। इसका परिणाम यह होगा कि मध्यस्थ का 29.06.2006 का निर्णय अपनी समग्रता में बहाल किया जाता है।”

अपील को बिना किसी लागत आदेश के स्वीकार कर लिया गया।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: मेसर्स भगीरथ इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम केरल राज्य
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 39/2026 (@ एसएलपी (सिविल) नंबर 7338/2025)
  • कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

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