धारा 200 CrPC | प्रथम दृष्टया साक्ष्य के बिना केवल अस्पष्ट आरोप आरोपियों को समन करने के लिए पर्याप्त नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के माध्यम से हाईकोर्ट ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (MM) और एडिशनल सेशंस जज (ASJ) के उन आदेशों को बरकरार रखा है, जिसमें धारा 200 Cr.P.C. के तहत दर्ज एक आपराधिक शिकायत को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए हत्या के प्रयास, मारपीट और धोखाधड़ी के आरोप अस्पष्ट थे और आरोपियों को समन करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं थे।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्रीमती रीमा अरोड़ा ने प्रतिवादियों—उत्तम चंद मीणा, उनकी पत्नी गार्गी मीणा और महेंद्र सिंह (पुलिस अधिकारी)—के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 307/511/323/34 के तहत शिकायत दर्ज की थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 9 सितंबर 2009 को उन्हें और उनके बेटे को थाने ले जाया गया जहाँ एक सब-इंस्पेक्टर ने उन्हें धमकी दी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि घर लौटने के बाद उत्तम चंद मीणा ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, एक पुराना मामला वापस लेने की धमकी दी और उनके साथ हाथापाई की। इसी बीच गार्गी मीणा ने उनके शरीर पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) डाल दिया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शोर मचाने पर उनके बेटे और पड़ोसी वहां इकट्ठा हो गए, जिसके बाद उन्हें बी.एस.ए. अस्पताल ले जाया गया जहाँ उनकी मेडिकल जांच (MLC) हुई।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारी महेंद्र सिंह सहित अन्य आरोपियों ने उन्हें ‘R.C.M.’ कंपनी का एजेंट बनाने के नाम पर 6,000 रुपये लिए, लेकिन न तो पैसे वापस किए और न ही कोई सामान दिया। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 22 जनवरी 2019 को साक्ष्यों के अभाव में शिकायत खारिज कर दी थी, जिसे बाद में सेशंस कोर्ट ने भी सही ठहराया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने अस्पताल की MLC रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि अस्पताल के रिकॉर्ड क्लर्क (CW-2) द्वारा सिद्ध की गई रिपोर्ट उनके इस आरोप की पुष्टि करती है कि उन पर केरोसिन डाला गया था। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपियों ने धोखाधड़ी से पैसे लिए और वापस मांगने पर झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी।

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प्रतिवादी: प्रतिवादी संख्या 3 (पुलिस अधिकारी महेंद्र सिंह) ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि वह याचिकाकर्ता से कभी नहीं मिले और न ही उनका किसी ‘R.C.M.’ स्कीम से कोई लेना-देना है। उन्होंने दलील दी कि उन्हें दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया जा रहा है और वह उस समय संबंधित थाने में तैनात भी नहीं थे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए याचिकाकर्ता के दावों में कई खामियां पाईं:

  1. मेडिकल साक्ष्य और देरी: हाईकोर्ट ने MLC (Ex. CW-1/A) का अवलोकन किया और पाया कि डॉक्टर ने किसी ऐसी चोट का उल्लेख नहीं किया है जो मारपीट के आरोपों की पुष्टि कर सके। इसके अलावा, कथित घटना सुबह 9:00 बजे हुई, जबकि शिकायत दोपहर 12:35 बजे दर्ज की गई। कोर्ट ने इस साढ़े तीन घंटे की देरी को स्पष्ट नहीं पाया।
  2. गवाहों का अभाव: कोर्ट ने गौर किया कि MLC के अनुसार याचिकाकर्ता के पति उन्हें अस्पताल ले गए थे, लेकिन पति का बयान दर्ज नहीं कराया गया। साथ ही, याचिकाकर्ता के इस दावे के बावजूद कि शोर सुनकर पड़ोसी जमा हो गए थे, किसी भी स्वतंत्र पड़ोसी या चश्मदीद गवाह को पेश नहीं किया गया।
  3. वित्तीय आरोपों में अस्पष्टता: 6,000 रुपये के भुगतान के संबंध में कोर्ट ने पाया कि शिकायत में न तो भुगतान की तारीख दी गई थी, न ही भुगतान का तरीका बताया गया था। इसके समर्थन में कोई रसीद या दस्तावेजी सबूत भी पेश नहीं किया गया।
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कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह स्थापित कानून है कि धारा 200 Cr.P.C. के तहत शिकायत पर संज्ञान लेने के चरण में, मजिस्ट्रेट को संतुष्ट होना चाहिए कि कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। प्रथम दृष्टया सामग्री के समर्थन के बिना केवल अस्पष्ट आरोपों का अस्तित्व, आरोपियों को समन करने के लिए अनिवार्य नहीं है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए कहा कि मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने शिकायत को सही तरीके से खारिज किया था क्योंकि इसमें प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता था। हाईकोर्ट ने याचिका और लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।

  • केस टाइटल: श्रीमती रीमा अरोड़ा बनाम राज्य (NCT दिल्ली) एवं अन्य
  • केस नंबर: CRL.M.C. 831/2021

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