सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट भर्ती में डिप्लोमा की अनिवार्यता को सही ठहराया, बी.फार्मा और एम.फार्मा डिग्री धारकों की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट संवर्ग नियमावली, 2014 (2024 में संशोधित) के नियम 6(1) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को फार्मासिस्ट पद के लिए ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ को अनिवार्य योग्यता के रूप में निर्धारित करने का पूरा अधिकार है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी.फार्मा) और मास्टर ऑफ फार्मेसी (एम.फार्मा) डिग्री धारकों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिन्होंने आवश्यक डिप्लोमा न होने के कारण भर्ती प्रक्रिया से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कानूनी सवाल यह था कि क्या हाईकोर्ट द्वारा बिहार फार्मासिस्ट संवर्ग नियमों को सही ठहराना उचित था, जिसमें फार्मासिस्ट (मूल श्रेणी) के पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ निर्धारित की गई थी। अपीलकर्ताओं का तर्क था कि बी.फार्मा या एम.फार्मा जैसी उच्च योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों को भी पात्र माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि योग्यता का निर्धारण करना नियोक्ता (Employer) का विशेष अधिकार क्षेत्र है और यह भर्ती नीति का मामला है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिनके पास ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ की बुनियादी योग्यता नहीं है, वे केवल उच्च डिग्री के आधार पर पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं, क्योंकि दोनों पाठ्यक्रमों के उद्देश्य और प्रशिक्षण संरचना अलग-अलग हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बिहार फार्मासिस्ट संवर्ग नियमावली, 2014 से उत्पन्न हुआ, जिसे 10 अक्टूबर, 2014 को अधिसूचित किया गया था। नियम 6(1) के तहत सीधी भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ के साथ इंटरमीडिएट/10+2 (विज्ञान) और बिहार फार्मेसी काउंसिल में पंजीकरण निर्धारित की गई थी। परिशिष्ट-I (Appendix-I) में एक “नोट” था जिसमें कहा गया था कि बी.फार्मा/एम.फार्मा धारक भी आवेदन कर सकते हैं।

बाद के संशोधनों और भर्ती अधिसूचनाओं के बाद विवाद तब गहरा गया जब राज्य ने ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ को आवश्यक योग्यता के रूप में निर्धारित किया, जिससे वे डिग्री धारक बाहर हो गए जिनके पास डिप्लोमा नहीं था। पटना हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शुरुआत में डिग्री धारकों को अनुमति दी थी, लेकिन 10 जनवरी, 2023 को खंडपीठ ने उस आदेश को रद्द कर दिया।

इसके बाद, राज्य ने 24 अक्टूबर, 2024 को बिहार फार्मासिस्ट संवर्ग (संशोधन) नियमावली, 2024 अधिसूचित की। इस संशोधन में परिशिष्ट-I के नोट को बदलकर यह शर्त जोड़ी गई कि “बी.फार्मा और एम.फार्मा प्रमाण पत्र धारक पात्र हो सकते हैं, बशर्ते उनके पास डिप्लोमा इन फार्मेसी की योग्यता हो।”

इस प्रावधान से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने 10 अप्रैल, 2025 को उनकी रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि ये नियम फार्मेसी अधिनियम, 1948 और फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) द्वारा बनाए गए फार्मेसी प्रैक्टिस विनियम, 2015 के विपरीत हैं। उनका कहना था कि केंद्रीय नियमों के तहत, डिप्लोमा और बैचलर डिग्री धारक दोनों ही फार्मासिस्ट के रूप में नियुक्त होने के पात्र हैं। उन्होंने तर्क दिया कि “न्यूनतम” योग्यता का मतलब उच्च योग्यता को रोकना नहीं होना चाहिए और उच्च योग्यता वाले उम्मीदवारों को बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

READ ALSO  पूर्व भ्रष्टाचार निरोधक न्यायाधीश नाबालिग से दुर्व्यवहार के आरोपों से बरी

बिहार राज्य ने तर्क दिया कि भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता तय करना नियोक्ता के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है। यह कहा गया कि डिप्लोमा और डिग्री पाठ्यक्रम अलग-अलग उद्देश्यों के साथ डिजाइन किए गए हैं; जबकि डिग्री धारकों के पास उच्च शैक्षणिक योग्यता होती है, डिप्लोमा धारकों को अस्पताल सेवाओं के लिए आवश्यक व्यावहारिक और तकनीकी कौशल पर विशेष ध्यान देने के साथ प्रशिक्षित किया जाता है। राज्य ने जोर दिया कि डिप्लोमा धारक अस्पताल सेवाओं के लिए अधिक उपयुक्त हैं, जबकि डिग्री धारकों के पास औद्योगिक रोजगार (Industrial Employment) में भी अवसर हैं।

कोर्ट का विश्लेषण

फैसला सुनाते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने नियमों में विरोधाभास (Repugnancy) के तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि फार्मेसी अधिनियम, 1948 और 2015 के विनियम पेशेवर विनियमन और पंजीकरण के क्षेत्र में कार्य करते हैं, जबकि संवर्ग नियम (Cadre Rules) सार्वजनिक रोजगार के क्षेत्र में लागू होते हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की: “अधिनियम केवल उन पात्र व्यक्तियों का एक समूह (Pool) बनाता है जिन्हें फार्मासिस्ट के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, 2015 के विनियम यह प्रमाणित करते हैं कि तकनीकी रूप से फार्मासिस्ट के रूप में अभ्यास करने के लिए कौन सक्षम है, जबकि संवर्ग नियम सार्वजनिक रोजगार के लिए व्यापक समूह में से चयन करने में राज्य की नीतिगत पसंद को दर्शाते हैं।”

पीठ ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि आवश्यक योग्यताओं का निर्धारण करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है। जहूर अहमद राथर बनाम शेख इम्तियाज अहमद (2019) और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग बनाम संदीप श्रीराम वारडे (2019) सहित अन्य उदाहरणों पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का विस्तार निर्धारित योग्यताओं के दायरे को बढ़ाने या समकक्षता (Equivalence) निर्धारित करने तक नहीं हो सकता।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने कहा: चार किस्तों में OROP बकाया के भुगतान पर रक्षा मंत्रालय कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता

पाठ्यक्रमों के बीच विशिष्ट अंतर को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने राज्य द्वारा दिए गए तर्कसंगत आधार को स्वीकार किया: “डिप्लोमा इन फार्मेसी पाठ्यक्रम में 500 घंटे का अनिवार्य व्यावहारिक प्रशिक्षण अनिवार्य है, जिसमें 250 घंटे नुस्खे (Prescriptions) देने के लिए समर्पित हैं… जबकि, बी.फार्मा कोर्स विनियम, 2014 के तहत, डिग्री छात्रों को 150 घंटे के व्यावहारिक प्रशिक्षण से गुजरना आवश्यक है… डिप्लोमा और स्नातक अलग-अलग विषयों में प्रशिक्षित होते हैं।”

कोर्ट ने रोजगार के अवसरों के संबंध में राज्य के नीतिगत तर्क को भी स्वीकार किया। यह नोट किया गया कि डिग्री धारकों के पास दवा निर्माण और ड्रग इंस्पेक्टर के रूप में अवसर हैं, जो डिप्लोमा धारकों के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

READ ALSO  यदि पति अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय खुद को अत्यधिक शराब पीने की आदत में शामिल कर लेता है तो यह पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ के साथ 10+2 की पात्रता मानदंड निर्धारित करना न तो मनमाना है और न ही तर्कहीन। कोर्ट ने कहा: “राज्य ने पंजीकृत फार्मासिस्टों के बड़े समूह के भीतर से उम्मीदवारों के एक संकीर्ण जलग्रहण क्षेत्र (Narrower Catchment) की पहचान की है जिसे वह किसी विशेष उद्देश्य के लिए सबसे उपयुक्त मानता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिग्री धारकों का पूर्ण बहिष्कार नहीं है, क्योंकि वे पात्र बने रहते हैं बशर्ते उनके पास ‘डिप्लोमा इन फार्मेसी’ की आवश्यक योग्यता भी हो। नतीजतन, अपीलें खारिज कर दी गईं और संवर्ग नियमों की वैधता को बरकरार रखा गया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: मो. फिरोज मंसूरी व अन्य बनाम बिहार राज्य व अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 12236 of 2025 से उत्पन्न) (2026 INSC 68)
  • कोरम: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles