यदि अनुबंध में रोक हो, तो आर्बिट्रेटर ‘प्री-अवॉर्ड ब्याज’ नहीं दे सकते; सुप्रीम कोर्ट ने पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज दर में की कटौती

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि मूल अनुबंध (Contract) में ब्याज देने पर स्पष्ट रोक है, तो आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ‘प्री-अवॉर्ड’ या ‘पेंडेंट लाइट’ (मुकदमे के दौरान) ब्याज नहीं दे सकता, भले ही उसे “मुआवजे” (Compensation) का नाम क्यों न दिया जाए। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि आर्बिट्रेशन एंड कॉनसिलीएशन एक्ट, 1996 के तहत, अवॉर्ड से पहले की अवधि के ब्याज के संबंध में अनुबंध की शर्तें “सर्वोपरि महत्व” रखती हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (L&T) के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। अदालत ने प्री-अवॉर्ड ब्याज के आदेश को रद्द कर दिया और पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज दर को 12% से घटाकर 8% वार्षिक कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 2011 के एक अनुबंध से जुड़ा है, जो उत्तर मध्य रेलवे प्रशासन और L&T के बीच झांसी वर्कशॉप के आधुनिकीकरण के लिए हुआ था। इस परियोजना की कुल लागत लगभग ₹93.08 करोड़ थी। कार्य पूरा करने की मूल अवधि 18 महीने (जुलाई 2012 तक) तय की गई थी, लेकिन इसे 10 बार बढ़ाया गया, जिससे परियोजना में 40 महीने की देरी हुई।

भुगतान में देरी और अन्य कारणों से L&T ने कई दावे पेश किए। आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल (AT) ने 25 दिसंबर, 2018 को L&T के पक्ष में ₹5.53 करोड़ का अवॉर्ड पारित किया। ट्रिब्यूनल ने दावे संख्या 1, 3 और 6 के तहत ऐसी राशि भी दी जिसमें ब्याज या “मुआवजा” शामिल था, जबकि अनुबंध की शर्तों के अनुसार ब्याज देय नहीं था। केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ झांसी की कमर्शियल कोर्ट और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन दोनों अदालतों ने आर्बिट्रल अवॉर्ड को बरकरार रखा। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (केंद्र सरकार): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट (GCC) के क्लॉज 16(3) और 64(5) के तहत अनुबंध की किसी भी राशि पर ब्याज देने पर पूर्ण प्रतिबंध था। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ब्राइट पावर प्रोजेक्ट्स (इंडिया) (पी) लिमिटेड (2015) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 31(7)(a) के तहत आर्बिट्रेटर की शक्तियां अनुबंध की शर्तों के अधीन हैं।

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प्रतिवादी (L&T): वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि क्लॉज 16(3) की व्याख्या केवल अमानत राशि (Earnest Money) और सुरक्षा जमा (Security Deposit) तक सीमित होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि कुछ दावे “स्वीकृत राशि” से संबंधित थे, इसलिए उन पर ब्याज की रोक लागू नहीं होनी चाहिए।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या GCC के क्लॉज 16(3) और 64(5) की मौजूदगी में ट्रिब्यूनल “मुआवजे” के रूप में ब्याज दे सकता था।

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1. प्री-अवॉर्ड ब्याज पर अनुबंधात्मक रोक कोर्ट ने L&T के तर्कों को खारिज करते हुए यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मनराज एंटरप्राइजेज (2022) का हवाला दिया। न्यायालय ने कहा कि धारा 31(7)(a) आर्बिट्रेटर को ब्याज देने की शक्ति देती है, लेकिन यह अनुबंध की शर्तों के अधीन है। कोर्ट ने कहा:

“1996 के अधिनियम के प्रावधान… पक्षों के बीच हुए अनुबंध को सर्वोपरि महत्व देते हैं और आर्बिट्रेटर की प्री-अवॉर्ड ब्याज देने की शक्ति को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करते हैं, यदि पक्षों ने इसके विपरीत सहमति व्यक्त की हो।”

कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने दावे संख्या 1, 3 और 6 में मुआवजे के नाम पर ब्याज देकर “गंभीर त्रुटि” की है, जबकि उसने स्वयं दावे संख्या 7 (ब्याज का दावा) को अनुबंध के उल्लंघन के कारण खारिज कर दिया था।

2. पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज का अंतर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्री-अवॉर्ड और पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज अलग-अलग कानूनी श्रेणियों में आते हैं। जहां प्री-अवॉर्ड ब्याज अनुबंध पर निर्भर है, वहीं पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज धारा 31(7)(b) द्वारा संचालित होता है, जो अनुबंध की शर्तों से ऊपर है। आर.पी. गर्ग बनाम मुख्य महाप्रबंधक, दूरसंचार विभाग (2024) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“धारा 31(7)(b), क्लॉज (a) के विपरीत है और यह पक्षों की स्वायत्तता के अधीन नहीं है। दूसरे शब्दों में, क्लॉज (b) पक्षों को अवॉर्ड के बाद की अवधि के लिए ब्याज को अनुबंध से बाहर करने का अधिकार नहीं देता है।”

3. ब्याज दर में संशोधन हालांकि कोर्ट ने पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज को जायज माना, लेकिन ट्रिब्यूनल द्वारा तय की गई 12% की दर को अत्यधिक पाया। गायत्री बालसामी बनाम मेसर्स ISG नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (2025) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दर को संशोधित किया:

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“अवॉर्ड में 12% प्रति वर्ष की दर तय करने का कोई औचित्य नहीं दिया गया है… समकालीन आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए ऐसी दर एक अत्यधिक वित्तीय बोझ होगी और न्यायसंगत मुआवजे के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होगी।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और कमर्शियल कोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया और आर्बिट्रल अवॉर्ड में दावे संख्या 1, 3 और 6 के तहत दिए गए प्री-अवॉर्ड ब्याज को हटा दिया।

न्यायालय ने अवॉर्ड में निम्नलिखित संशोधन किए:

  1. प्री-अवॉर्ड ब्याज से संबंधित हिस्सों को पूरी तरह हटा दिया गया।
  2. पोस्ट-अवॉर्ड ब्याज की दर को 12% से घटाकर 8% वार्षिक कर दिया गया, जो अवॉर्ड की तारीख से भुगतान तक देय होगा।
  • केस का शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (एलएंडटी)
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ 2026 की (@ एसएलपी (सिविल) संख्या 14989 2023 की)

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