सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (13 जनवरी) को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) की धारा 12(1)(c) का कार्यान्वयन केवल दिशानिर्देशों (Guidelines) या मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह धारा पड़ोस के स्कूलों (Neighbourhood Schools) में कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करती है।
जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सक्षम अधिकारियों को धारा 38 के तहत अधीनस्थ विधान (Subordinate Legislation) के रूप में आवश्यक नियम और विनियम (Rules and Regulations) बनाने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना लागू करने योग्य नियमों के, अनुच्छेद 21A और धारा 12(1)(c) का उद्देश्य एक “मृत पत्र” (Dead Letter) बनकर रह जाएगा। इसी के साथ कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को अनुपालन की निगरानी के लिए पक्षकार बनाया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक अभिभावक, दिनेश बीवाजी अष्टिकर द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने 2016 में अपने बच्चों के प्रवेश के लिए एक ‘नेबरहुड स्कूल’ से संपर्क किया था। सूचना का अधिकार (RTI) से मिली जानकारी के अनुसार सीटें खाली थीं और जिला परिषद के प्राथमिक शिक्षा अधिकारी ने भी प्रवेश का समर्थन किया था, लेकिन स्कूल ने प्रवेश नहीं दिया।
जब याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दिया कि “याचिकाकर्ता ने मुफ्त शिक्षा कोटे में अपने बच्चों के प्रवेश के लिए उचित कदम नहीं उठाए।” हाईकोर्ट का आशय ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन न करने से था, जबकि याचिकाकर्ता का परिवार अत्यंत गरीब था और स्कूल उनके घर से 3 किमी के भीतर था।
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि समय बीतने के कारण याचिकाकर्ता के लिए राहत अब निष्प्रभावी हो चुकी है, लेकिन भविष्य में अन्य अभिभावकों को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े, इसलिए कोर्ट ने इसे “मिसाल बनाने” (Precedent Making) के उद्देश्य से सुना।
एमिकस क्यूरी की दलीलें और मुख्य समस्याएं
कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सेंथिल जगदीसन को एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) नियुक्त किया। एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि कई कारणों से 25% कोटे का लाभ पात्र बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है:
- डिजिटल साक्षरता की कमी: प्रवेश प्रक्रिया का पूरी तरह ऑनलाइन होना गरीब अभिभावकों के लिए बाधा है।
- भाषा की बाधा: स्थानीय भाषाओं में जानकारी का अभाव।
- सहायता की कमी: अभिभावकों की मदद के लिए हेल्प-डेस्क का न होना।
- पारदर्शिता का अभाव: सीटों की उपलब्धता और शिकायत निवारण में स्पष्टता की कमी।
एमिकस क्यूरी और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने संयुक्त सुझाव दिए, जिसमें केंद्रीयकृत ऑनलाइन पोर्टल, हेल्प-डेस्क की स्थापना और आवेदन में कमियों को सुधारने के लिए एक ‘विंडो’ देने की बात कही गई।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
फैसले को लिखते हुए जस्टिस नरसिम्हा ने RTE एक्ट की परिवर्तनकारी प्रकृति पर जोर दिया। पीठ ने कहा:
“समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को 25% तक प्रवेश देने का ‘नेबरहुड स्कूल’ का दायित्व हमारे समाज की सामाजिक संरचना को बदलने की असाधारण क्षमता रखता है। इसका ईमानदारी से कार्यान्वयन वास्तव में परिवर्तनकारी हो सकता है।”
पांच प्रमुख कर्तव्य-धारक (Duty Bearers) कोर्ट ने अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए पांच प्रमुख कर्तव्य-धारकों की पहचान की:
- समुचित सरकार (Appropriate Government): स्कूल स्थापित करने के लिए।
- स्थानीय प्राधिकरण (Local Authority): स्कूलों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और प्रवेश की निगरानी के लिए।
- नेबरहुड स्कूल: मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए।
- माता-पिता/अभिभावक: शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए (अनुच्छेद 51A(k))।
- प्राथमिक स्कूल शिक्षक: राष्ट्र निर्माण में भूमिका के लिए।
बंधुत्व (Fraternity) का संवैधानिक दर्शन कोर्ट ने धारा 12 को संविधान के ‘बंधुत्व’ के मूल्य से जोड़ा। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह मानक और संरचनात्मक रूप से संभव बनाता है कि एक करोड़पति का बच्चा या यहां तक कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज का बच्चा, एक ऑटो-रिक्शा चालक या सड़क पर विक्रेता के बच्चे के साथ एक ही कक्षा में और एक ही बेंच पर बैठे।”
दिशानिर्देशों की अपर्याप्तता कोर्ट ने NCPCR द्वारा जारी एसओपी (SOP) की समीक्षा की। पीठ ने माना कि हालांकि इसमें विस्तृत चरण हैं, लेकिन इन दिशानिर्देशों में कानूनी बाध्यता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करने के लिए वैधानिक नियम बनाना अनिवार्य है।
फैसला और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- नियम बनाना: सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे NCPCR, राज्य आयोगों (SCPCRs) और सलाहकार परिषदों के परामर्श से धारा 12(1)(c) को लागू करने के लिए धारा 38 के तहत आवश्यक नियम और विनियम बनाएं।
- NCPCR की भूमिका: अनुपालन और निगरानी के लिए NCPCR को प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया।
- हलफनामा: NCPCR को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा बनाए गए नियमों की जानकारी एकत्र करनी होगी और 31 मार्च 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करना होगा।
- अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को होगी।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: दिनेश बीवाजी अष्टिकर बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य
- केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 10105 / 2017
- कोरम: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर

