सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द; घातक दुर्घटना मामले में मृतक ड्राइवर के परिवार को मुआवजा बहाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में तेलंगाना हाईकोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया है, जिसमें एक मृतक ड्राइवर के परिवार को दिए गए मुआवजे को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने ‘वर्कमैन कंपनसेशन कमिश्नर’ (कामगार मुआवजा आयुक्त) द्वारा पारित आदेश को बहाल करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की कि वाहन मालिक और मृतक के बीच कोई नियोक्ता-कर्मचारी (employer-employee) संबंध नहीं था, खासकर तब जब मालिक ने खुद इस बात को स्वीकार किया था।

यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पंगंति विजया बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड व अन्य (सिविल अपील, 2024 की एसएलपी (सी) संख्या 15218 से उत्पन्न) के मामले में सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि 

यह मामला 10 सितंबर 2004 को हुई एक घातक दुर्घटना से जुड़ा है। मृतक, पंगंति सुरेश, पांचवें प्रतिवादी (वाहन मालिक) के पास 3,500 रुपये के मासिक वेतन पर बतौर ड्राइवर कार्यरत थे। हैदराबाद से वाहन संख्या AP-15L-4000 चलाते समय, विपरीत दिशा से आ रहे एक लॉरी ने उनकी कार को टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में कार में सवार दो लोगों की मौत हो गई, जिनमें सुरेश भी शामिल थे।

मृतक के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में अपीलकर्ता ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (Workmen’s Compensation Act, 1923) के तहत दावा दायर किया। उन्होंने कहा कि मृतक पांचवें प्रतिवादी द्वारा नियोजित था और दुर्घटना रोजगार के दौरान और उसी के कारण हुई थी।

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निचली अदालतों में कार्यवाही 

शुरुआती कार्यवाही के दौरान, वाहन के मालिक सत्यनारायणन ने जवाबी हलफनामा दायर कर यह इनकार किया कि मृतक उनके रोजगार में था। हालांकि, बाद में अपनी गवाही (cross-examination) और पुनः परीक्षा (re-examination) के दौरान, उन्होंने स्वीकार किया कि मृतक वास्तव में उनके द्वारा नियोजित था। उन्होंने स्पष्ट किया कि शुरुआती इनकार भ्रम के कारण हुआ था, क्योंकि दुर्घटना मृतक को नौकरी पर रखने के अगले ही दिन हो गई थी।

मौखिक और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर, ‘कामगार मुआवजा आयुक्त और उप श्रम आयुक्त, निज़ामाबाद’ ने 30 अप्रैल 2009 को एक अवार्ड पारित किया। कमिश्नर ने पाया कि मृतक एक ड्राइवर के रूप में नियोजित था और दुर्घटना रोजगार के दौरान हुई थी। तदनुसार, कमिश्नर ने बीमा कंपनी और मालिक पर संयुक्त और अलग-अलग दायित्व तय करते हुए उन्हें 3,73,747 रुपये का मुआवजा 12% प्रति वर्ष की ब्याज दर के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट का निर्णय 

बीमा कंपनी ने कमिश्नर के आदेश को तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 22 मार्च 2022 को अपने आदेश (सीएमए संख्या 98/2010) के माध्यम से अपील स्वीकार कर ली और कमिश्नर के अवार्ड को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि हाईकोर्ट ने “प्रतिवादी संख्या 5 (मालिक) द्वारा दायर किए गए पहले के जवाबी हलफनामे पर भरोसा करते हुए गलती से यह तथ्य दर्ज किया कि मृतक और वाहन के मालिक के बीच कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं था।” शीर्ष अदालत ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट ने गलत तरीके से यह दर्ज किया कि एफआईआर अपीलकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई थी, जबकि वास्तव में यह दूसरे मृतक की पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय 

सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों और निचली अदालतों के निष्कर्षों की बारीकी से जांच की। पीठ ने कहा कि कमिश्नर का निष्कर्ष “सबूतों की सही सराहना पर आधारित था और इसमें कोई कानूनी कमी नहीं थी।”

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही के दौरान, वाहन मालिक शुरू में उपस्थित नहीं हुआ, जिसके कारण अदालत को जमानती और बाद में गैर-जमानती वारंट जारी करने पड़े। पेश होने पर, मालिक ने शपथ पत्र दायर कर स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि मृतक सुरेश उनके रोजगार में था।

अदालत ने नोट किया: “उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कमिश्नर के समक्ष जवाबी हलफनामे में रोजगार के तथ्य से उनका इनकार केवल नागरिक दायित्व (civil liability) से बचने के लिए था।”

इस स्वीकृति और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “उपरोक्त के मद्देनजर, हम यह मानते हैं कि मृतक एक ड्राइवर के रूप में नियोजित था और उसकी मृत्यु उसके रोजगार के दौरान और उसी कारण से हुई। अपीलकर्ता के दावे को कमिश्नर द्वारा सही रूप से स्वीकार किया गया था और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप अनुचित था।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 22 मार्च 2022 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने कामगार मुआवजा आयुक्त द्वारा पारित 30 अप्रैल 2009 के आदेश को बहाल कर दिया।

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मुआवजे के वितरण के संबंध में, अदालत ने नोट किया कि मूल राशि और ब्याज पहले ही बीमा कंपनी द्वारा हाईकोर्ट में अपील दायर करते समय जमा कर दी गई थी, और अपीलकर्ता ने राशि का एक तिहाई हिस्सा निकाल लिया था।

अदालत ने निर्देश दिया: “अपीलकर्ता को हाईकोर्ट में जमा शेष राशि को अर्जित ब्याज सहित निकालने की अनुमति दी जाती है। तेलंगाना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल यह सुनिश्चित करेंगे कि रजिस्ट्री के समक्ष इस आदेश को दाखिल करने के चार सप्ताह के भीतर राशि जारी कर दी जाए।”

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: पंगंति विजया बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड व अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (2024 की एसएलपी (सी) संख्या 15218 से उत्पन्न) (2026 INSC 9)
  • कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

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