सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आगामी फिल्म “यादव जी की लव स्टोरी” पर प्रतिबंध लगाने या उसका नाम बदलने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि फिल्म का शीर्षक यादव समुदाय को किसी भी प्रकार से नकारात्मक रूप में प्रस्तुत नहीं करता और यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए जा सकने वाले युक्तिसंगत प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आता।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने विश्व यादव परिषद के प्रमुख द्वारा दायर याचिका पर रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद इसे खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि फिल्म का शीर्षक यादव समुदाय के बारे में समाज में गलत धारणा पैदा करता है और एक आपत्तिजनक स्टीरियोटाइप बनाता है। साथ ही महिला पात्र के चित्रण पर भी आपत्ति जताई गई।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उन्हें अंतर-समुदाय विवाह से आपत्ति नहीं है, लेकिन फिल्म में महिला का प्रस्तुतिकरण अनुचित है। उन्होंने कहा कि फिल्म स्वयं को एक सच्ची घटना पर आधारित बताती है और “एक महिला को इस प्रकार प्रचारित नहीं किया जा सकता।”
पीठ ने इन आशंकाओं को निराधार बताया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा:
“हम समझ नहीं पा रहे हैं कि किसी फिल्म का शीर्षक किस प्रकार किसी समुदाय को खराब रोशनी में दिखा सकता है। शीर्षक में कोई ऐसा विशेषण या शब्द नहीं है जो यादव समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता हो।”
न्यायालय ने पाया कि याचिका केवल शीर्षक के आधार पर दायर की गई है और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सामग्री नहीं है जिससे यह साबित हो कि समुदाय के प्रति कोई अपमानजनक संकेत है। पीठ ने यह भी कहा कि फिल्म एक काल्पनिक रचना है।
न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश “घूसखोर पंडित” मामले से इस प्रकरण को अलग बताया। उस मामले में “घूसखोर” शब्द का अर्थ भ्रष्ट होता है, जिससे एक समुदाय के साथ नकारात्मक अर्थ जुड़ रहा था।
न्यायालय ने कहा:
“वर्तमान मामले में यादव समुदाय के साथ कोई नकारात्मकता नहीं जुड़ी है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए जा सकने वाले किसी भी युक्तिसंगत प्रतिबंध का इस मामले में कोई आधार नहीं बनता। शीर्षक किसी भी प्रकार से समुदाय को “खराब या नकारात्मक” रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।

