सुप्रीम कोर्ट: कैडर आवंटन प्रक्रिया हमेशा के लिए ‘अस्थिर’ नहीं रह सकती; 20 साल बाद कैडर बदलाव की मांग कर रहे आईपीएस की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल सेवा परीक्षा में कैडर आवंटन (Cadre Allocation) की प्रक्रिया को अनिश्चित काल तक खुला या “अस्थिर” (Fluid) नहीं रखा जा सकता। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने तमिलनाडु कैडर के एक आईपीएस अधिकारी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 2004 की एक रिक्ति के आधार पर राजस्थान कैडर आवंटित करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया में एक समय पर पूर्णता (Finality) आनी चाहिए।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद 2004 की सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ा है। अपीलकर्ता रूपेश कुमार मीणा, जो अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी से आते हैं, का चयन आईपीएस के लिए हुआ और उन्हें तमिलनाडु कैडर आवंटित किया गया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों को चुनौती दी थी, जिसने उनके राजस्थान कैडर के दावे को खारिज कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि ऋषिकेश मीणा, जो 2003 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के आईपीएस अधिकारी थे, ने 2004 की परीक्षा में फिर से सफलता प्राप्त की। उन्हें राजस्थान कैडर में ‘इनसाइडर’ (Insider) रिक्ति की पेशकश की गई, लेकिन वरिष्ठता (Seniority) के नुकसान के कारण उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद, मेरिट सूची में अगले उम्मीदवार राजेश कुमार ने इस ‘इनसाइडर’ रिक्ति पर दावा किया। जब केंद्र ने उनका दावा खारिज किया, तो ट्रिब्यूनल ने 2008 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, केंद्र सरकार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस दौरान राजेश कुमार का चयन आईएएस (IAS) में हो गया, जिससे उनकी आईपीएस कैडर की मांग समाप्त हो गई। 2010 में हाईकोर्ट ने मामला निपटा दिया। इसके बाद, मेरिट में तीसरे नंबर पर मौजूद रूपेश कुमार मीणा ने दावा किया कि चूंकि उनसे ऊपर के दो उम्मीदवारों ने राजस्थान कैडर ज्वाइन नहीं किया, इसलिए यह उन्हें दिया जाना चाहिए।

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दलीले और पक्ष

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि रिक्ति खाली रह गई थी क्योंकि ऋषिकेश मीणा ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजेश कुमार आईएएस में चले गए। उन्होंने कहा कि उनका इस रिक्ति पर “वैध अधिकार” है और यह केवल कैडर का सुधार (Correction) है, न कि बदलाव। देरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि स्थिति 2010 में स्पष्ट हुई थी, जिसके बाद उन्होंने तुरंत ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।

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दूसरी ओर, भारत संघ (Union of India) ने इसका कड़ा विरोध किया। केंद्र ने तर्क दिया कि 2004 की रिक्ति के लिए 2010 में आवेदन करना बहुत अधिक देरी है। यह भी कहा गया कि एक बार जब किसी चयनित उम्मीदवार को कैडर आवंटित कर दिया जाता है, तो वह रिक्ति “उपभोग” (Consumed) कर ली गई मानी जाती है। सरकार ने दलील दी कि अगर अब अपीलकर्ता को तमिलनाडु से राजस्थान भेजा जाता है, तो तमिलनाडु कैडर में 2004 के लिए एक रिक्ति बन जाएगी, जिससे पूरी सूची में बदलाव करना पड़ेगा और एक “चेन रिएक्शन” शुरू हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अपीलकर्ता पहले से ही तमिलनाडु में कार्यरत हैं और 2004 के बाद से 20 से अधिक चयन प्रक्रियाएं हो चुकी हैं।

कोर्ट ने अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि दूसरे उम्मीदवार के ज्वाइन न करने पर उन्हें वह पद मिलना चाहिए था। पीठ ने टिप्पणी की:

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“हमारे विचार में, ऐसी प्रक्रिया को अपनाया नहीं जा सकता। इसका परिणाम यह होगा कि कैडर आवंटन या परिवर्तन की प्रक्रिया आने वाले समय के लिए हमेशा अस्थिर (Fluid) बनी रहेगी।”

जस्टिस बिंदल ने फैसले में लिखा कि अगर अपीलकर्ता को अब राजस्थान भेजा जाता है, तो उनके नीचे का कोई उम्मीदवार तमिलनाडु या किसी अन्य राज्य के लिए दावा कर सकता है। कोर्ट ने कहा:

“चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया जो यह दर्शाता हो कि 2004 की वह ‘इनसाइडर’ रिक्ति 20 साल बीत जाने के बाद भी खाली पड़ी है। अंततः, कोर्ट ने अपील को योग्यता रहित मानते हुए खारिज कर दिया।

मामले का विवरण (Case Details):

  • वाद शीर्षक: रूपेश कुमार मीणा बनाम भारत संघ व अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 11302-11303 ऑफ 2016
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर

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