सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें देशभर में खाद्य सुरक्षा (फूड सेफ्टी) मानकों की निगरानी के लिए एक नेशनल टास्क फोर्स के गठन की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिकाकर्ता से पूछा कि इतनी बड़ी मांग लेकर अदालत आने से पहले उन्होंने जमीनी स्तर पर कितनी रिसर्च की है।
कोर्ट ने फिलहाल इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिका में मांग की गई थी कि देशभर के फूड मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, रेस्टोरेंट्स और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का समयबद्ध तरीके से ऑडिट और निरीक्षण किया जाए।
खुद कोर्ट में पेश हुए याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह मामला देश के लगभग हर नागरिक के स्वास्थ्य से जुड़ा है। याचिका में कहा गया कि भारतीय बाजार में असुरक्षित, मिलावटी और खतरनाक खाद्य पदार्थों की भरमार है, जिससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान में लागू नियम और निगरानी तंत्र नाकाफी हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए याचिका में निम्नलिखित मांगें रखी गईं:
- सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में एक नेशनल टास्क फोर्स या कमेटी का गठन हो।
- देशभर में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक समयबद्ध ऑडिट और निरीक्षण अभियान चलाया जाए।
- सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जांच के बुनियादी ढांचे, टेस्टिंग लैब और प्रवर्तन कर्मियों की संख्या बढ़ाई जाए।
- खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन से प्रभावित पीड़ितों के लिए एक देशव्यापी शिकायत निवारण और मुआवजे का तंत्र बनाया जाए।
बेंच ने याचिकाकर्ता की तैयारी पर असंतोष व्यक्त किया। जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट शब्दों में पूछा:
“उपदेशों (sermons) के अलावा, इस याचिका को दायर करने से पहले आपने क्या तथ्य रखे हैं और आपकी रिसर्च क्या है?”
जब याचिकाकर्ता ने दोहराया कि यह मुद्दा “लगभग हर नागरिक को प्रभावित कर रहा है,” तो कोर्ट ने संकेत दिया कि नीतिगत निर्देश जारी करने के लिए केवल सामान्य बयानों के बजाय ठोस तथ्यों और सिस्टम की खामियों के दस्तावेजी सबूतों की आवश्यकता होती है।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को प्रतिवादी बनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि वह याचिका की विचारणीयता और इसमें की गई मांगों पर एक विस्तृत आदेश जारी करेगा।

