विवाहित महिला के साथ शारीरिक संबंध में ‘शादी का झांसा’ देकर दुष्कर्म का दावा संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की FIR

सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा है, तो उसके साथ शारीरिक संबंध को शादी के झूठे वादे या “छल” (Deception) के आधार पर प्रेरित नहीं माना जा सकता।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी की एफआईआर (FIR) रद्द करने की याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह रिश्ता “स्पष्ट रूप से और स्वीकार्य रूप से आपसी सहमति” पर आधारित था और इस मामले में अमोल भगवान नेहुल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के सिद्धांत पूरी तरह लागू होते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, अंकित तोमर पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) (एक ही महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया था। यह एफआईआर 28 मार्च, 2024 को फरीदाबाद के खेड़ीपुल थाने में दर्ज कराई गई थी।

शिकायतकर्ता, जो एक मसाज पार्लर की प्रभारी थी, ने आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता एक ग्राहक के रूप में वहां आया और उनके बीच शारीरिक संबंध बने। उसका दावा था कि यह रिश्ता अगस्त 2023 से मार्च 2024 तक इसलिए चला क्योंकि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था। हालांकि, अपीलकर्ता ने 12 मार्च, 2024 को किसी दूसरी महिला से शादी कर ली। शिकायतकर्ता का आरोप था कि जब उसने 15 मार्च को आरोपी को अपनी गर्भावस्था के बारे में बताया, तो उनके बीच झगड़ा हुआ।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मुख्य दलील यह थी कि रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति से बना था। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि चूंकि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और उसके दो बच्चे थे, इसलिए शादी का वादा पूरा करना कानूनी रूप से संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में “शादी के झांसे” या धोखे का कोई आधार नहीं बचता।

दूसरी ओर, हरियाणा राज्य की ओर से पेश सीनियर एएजी आलोक सांगवान ने दलील दी कि अभी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है और बच्चे (जिसकी मृत्यु हो चुकी है) के डीएनए प्रोफाइल की एफएसएल (FSL) रिपोर्ट अभी लंबित है, इसलिए कार्यवाही जारी रहनी चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अदालत ने अमोल भगवान नेहुल बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी शिकायत को रद्द करने के लिए चार प्रमुख आधार देखे जाते हैं: आपसी सहमति, लगातार शारीरिक संबंध, किसी भी प्रकार के प्रलोभन या खतरे का अभाव, और शिकायतकर्ता के शादीशुदा होने की स्थिति में धोखे की संभावना का न होना।

वर्तमान मामले पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“शिकायतकर्ता शादीशुदा है और दो बच्चों की माँ है, जैसा कि FIS (प्रारंभिक सूचना विवरण) से ही संकेत मिलता है। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उसका अपने पति से तलाक हो गया था या वह उससे अलग रह रही थी। हम आश्वस्त हैं कि जैसा कि उद्धृत फैसले में कहा गया है, यह एक सहमति से बना रिश्ता था, इसमें न तो कोई प्रलोभन था और न ही कोई धमकी, और शादी के बहाने शिकायतकर्ता को शारीरिक संबंध के लिए लुभाने की कोई संभावना नहीं थी।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि यह रिश्ता उसी मसाज पार्लर के परिसर में बना और जारी रहा जहां महिला खुद प्रभारी थी। अदालत ने एफएसएल रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा:

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“हमारी राय है कि एफएसएल रिपोर्ट का इंतजार करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि भले ही वह बच्चा अपीलकर्ता का ही पाया जाए, लेकिन आपसी सहमति शिकायतकर्ता के उस दावे को खत्म कर देती है कि शादी के वादे पर दुष्कर्म किया गया था।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं पाया। अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने फरीदाबाद के खेड़ीपुल थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 127 और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अपीलकर्ता द्वारा निष्पादित बेल बांड भी रद्द कर दिए गए।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: अंकित तोमर बनाम हरियाणा राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर (2026 की) [@ SLP (Crl.) No. 18044 of 2025]
  • पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • दिनांक: 26 फरवरी, 2026

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