सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर फेसबुक पोस्ट को लेकर जांच पर रोक लगाने से किया इनकार, दी अंतरिम जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. अली खान महमूदाबाद के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित दो फेसबुक पोस्ट को लेकर हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR की जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी है और मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच टीम (SIT) के गठन का निर्देश भी दिया है।

जांच पर रोक का कोई आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई की। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने गिरफ्तार प्रोफेसर की ओर से पेश होकर FIR और गिरफ्तारी को चुनौती दी।

कोर्ट ने कहा कि याचिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन “ऑनलाइन डाले गए दो पोस्ट को देखते हुए जिनके आधार पर FIR दर्ज की गई है, हम इस स्तर पर जांच पर रोक लगाने का कोई मामला नहीं पाते।”

SIT का गठन: हरियाणा और दिल्ली से नहीं होंगे अफसर

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पीठ ने हरियाणा के पुलिस महानिदेशक को तीन सदस्यीय SIT गठित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि SIT में कोई भी अधिकारी हरियाणा या दिल्ली से नहीं होना चाहिए और टीम में कम से कम एक महिला अधिकारी होना अनिवार्य है।

अंतरिम जमानत, लेकिन शर्तों के साथ

FIR रद्द करने या जांच पर रोक लगाने से इनकार करते हुए, कोर्ट ने प्रोफेसर महमूदाबाद को अंतरिम जमानत दे दी। उन्हें सोनीपत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुसार जमानती बांड भरने पर रिहा किया जाएगा।

हालांकि, कोर्ट ने जमानत के साथ यह शर्त लगाई कि प्रोफेसर अब:

  • जांच के अधीन दो फेसबुक पोस्ट,
  • हाल ही में भारत में हुए आतंकी हमले, और
  • उस हमले पर भारत की जवाबी कार्रवाई
    से संबंधित कोई भी ऑनलाइन पोस्ट, लेख या भाषण नहीं देंगे।
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भाषा पर सवाल, नीयत पर नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने प्रोफेसर की पोस्ट की भाषा और लहजे को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “प्रोफेसर की मंशा शायद युद्ध-विरोधी थी, लेकिन भाषा में कुछ हिस्से उकसाने वाले या राजनीतिक लग सकते हैं। वे अपने विचारों को सम्मानजनक और सरल भाषा में भी रख सकते थे, जिससे दूसरों की भावनाएं आहत न हों।”

वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने तर्क दिया कि फेसबुक पोस्ट देशभक्ति से भरा था, जिसका अंत “जय हिंद” से हुआ था और उसमें सेना की बहादुरी को सलाम किया गया था। उन्होंने सवाल उठाया, “इसमें कोई आपराधिकता नहीं है, फिर FIR सुबह 6:30 बजे इतनी जल्दी क्यों दर्ज की गई?”

सिब्बल ने यह भी बताया कि प्रोफेसर की पत्नी नौ महीने की गर्भवती हैं और मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।

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केंद्र ने याचिका का विरोध किया

हरियाणा राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल करने की बजाय प्रोफेसर को उच्च न्यायालय जाना चाहिए था क्योंकि वहां भी प्रभावी उपाय उपलब्ध हैं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि चूंकि वह याचिका को पहले ही सुनवाई के लिए स्वीकार कर चुकी है, इसलिए वह भाषा और स्वतंत्रता से संबंधित चिंताओं को ध्यान में रखते हुए उचित निर्देश जारी करेगी।

अब यह मामला शुक्रवार को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

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