सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उन तीन प्रमुख शिक्षाविदों का पक्ष सुनने पर सहमति व्यक्त की है, जिन्हें NCERT की एक पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ी “आपत्तिजनक” सामग्री के विवाद के बाद सरकारी परियोजनाओं से बाहर कर दिया गया था। इन विशेषज्ञों का तर्क है कि पाठ्यक्रम तैयार करना एक “सामूहिक प्रक्रिया” थी और किसी एक व्यक्ति के पास अंतिम सामग्री पर एकाधिकार या पूर्ण अधिकार नहीं था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इन अर्जियों को रिकॉर्ड पर लिया और मामले की विस्तृत सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है।
यह पूरा विवाद NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय से शुरू हुआ, जिस पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया था। 26 फरवरी को कोर्ट ने इस किताब के प्रकाशन और वितरण पर “पूर्ण प्रतिबंध” (Blanket Ban) लगा दिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ी सामग्री ने संस्थान को “लहूलुहान” (Bleed) कर दिया है।
इसके बाद, 11 मार्च को कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार से “अलग होने” (Disassociate) का निर्देश दिया था। पिछले आदेशों में कोर्ट ने कहा था कि उसे इस बात पर संदेह नहीं है कि या तो इन विशेषज्ञों को भारतीय न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, या उन्होंने जानबूझकर छात्रों के सामने न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया।
शिक्षाविदों का तर्क: ‘कोई चलता-फिरता व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित विद्वान’
सोमवार को शिक्षाविदों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि कोर्ट की पिछली टिप्पणियों से उनके मुवक्किलों की पेशेवर प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुँचा है।
आलोक प्रसन्ना कुमार की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने जोर देकर कहा कि इसमें शामिल विशेषज्ञ कोई “चलता-फिरता व्यक्ति” (Fly-by-night persons) नहीं हैं, बल्कि वे काफी विश्वसनीयता रखते हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि कुमार स्वयं एक वकील हैं और इस कोर्ट में पेश हो चुके हैं।
शंकरनारायणन ने दलील दी, “शिक्षाविद केवल संदर्भ (Context) स्पष्ट करना चाह रहे हैं। हमारा प्रयास कोर्ट को नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत आई नई शिक्षा पद्धति को समझाना है।” उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पाठ्यक्रम में न्यायपालिका को अलग से निशाना नहीं बनाया गया था, क्योंकि कक्षा 6 और 7 की किताबों में भी विधायिका, कार्यपालिका और चुनाव आयोग के सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र है।
सुपर्णा दिवाकर का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील जे. साई दीपक ने कहा, “इस अर्जी का सार यह है कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी और किसी एक व्यक्ति के पास कोई विशेष अधिकार नहीं था।” प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की ओर से वरिष्ठ वकील अरविंद दातार पेश हुए और स्पष्ट किया कि उनकी ओर से भी स्पष्टीकरण दाखिल कर दिया गया है।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज ने बेंच को बताया कि संशोधित अध्याय की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है।
इस समिति में शामिल हैं:
- जस्टिस इंदु मल्होत्रा (सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज)
- के.के. वेणुगोपाल (पूर्व अटॉर्नी जनरल)
- प्रकाश सिंह (गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति)
यह समिति भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के साथ मिलकर काम करेगी, जिसके प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस हैं। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि NCERT ने 2 अप्रैल को ‘नेशनल सिलेबस एंड टीचिंग लर्निंग मटेरियल कमेटी’ (NSTC) का पुनर्गठन किया है। एम.सी. पंत की अध्यक्षता वाली यह 20 सदस्यीय कमेटी अब राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सामग्री तैयार करने की देखरेख करेगी।
इससे पहले, कोर्ट ने NCERT के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी द्वारा दी गई “बिना शर्त माफी” को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, कोर्ट ने तीनों विशेषज्ञों के लिए स्पष्टीकरण देने और प्रतिबंध के आदेश में बदलाव की मांग करने का विकल्प खुला रखा था। अब बेंच उनके औपचारिक स्पष्टीकरणों की जांच करेगी ताकि यह तय किया जा सके कि उन्हें सार्वजनिक वित्त पोषित शैक्षणिक जिम्मेदारियों से दूर रखने के आदेश में संशोधन की आवश्यकता है या नहीं।

