सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज़ इन इंडिया (NCCI) की एक नई जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और 12 राज्यों से जवाब मांगा है, जिसमें इन राज्यों के धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने इस याचिका को पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ते हुए कहा कि इस पूरे मुद्दे की सुनवाई तीन-न्यायाधीशों की पीठ करेगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा के माध्यम से दाखिल इस याचिका में इन राज्य कानूनों के अमल पर रोक लगाने की भी मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि ये कानून धर्मांतरण के नाम पर नागरिकों को परेशान करने और झूठे मामलों में फंसाने का रास्ता खोलते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा, “नोटिस जारी करें। सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं को याचिका की प्रति उपलब्ध कराई जाए। चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किया जाए। सभी प्रतिवादी एक संयुक्त हलफनामा दाखिल करें। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।”
सुप्रीम कोर्ट ने जिन 12 राज्यों को नोटिस जारी किया है, उनमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, झारखंड, उत्तराखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं।
अरोड़ा ने बताया कि ओडिशा और राजस्थान ने हाल में नए कानून बनाए हैं जो पहले से लंबित याचिकाओं की परिधि में नहीं आते। उन्होंने कहा, “कुछ राज्यों ने कानूनों में संशोधन भी किए हैं जिन्हें अभी तक चुनौती नहीं दी गई है। मैं सभी स्टैंडिंग काउंसल को प्रति भेजूंगी।”
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राज्य कानून ऐसे हैं जो “धर्मांतरण के आरोप लगाने के लिए निगरानी समूहों को प्रोत्साहित करते हैं”, जिससे कई झूठी शिकायतें दर्ज की जा रही हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से पेश होकर कहा कि ऐसे कानून पहले से ही संविधान पीठ के फैसले के तहत आते हैं। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से जवाब तैयार है और जल्द दाखिल किया जाएगा।
16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इसी विषय पर दायर अन्य लंबित याचिकाओं पर विभिन्न राज्यों से जवाब मांगा था और कहा था कि वह इन कानूनों पर रोक लगाने के मुद्दे पर तभी विचार करेगा जब सभी पक्षों का जवाब प्राप्त हो जाएगा।
इससे पहले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की NGO ‘सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ द्वारा दायर याचिका में भी इन कानूनों को चुनौती दी गई थी। केंद्र सरकार ने इस याचिका पर आपत्ति जताते हुए NGO की निष्पक्षता और मंशा पर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि यह “चुनिंदा राजनीतिक हितों” के इशारे पर काम करता है।
उत्तर प्रदेश धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 और उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 सहित कई राज्य कानूनों को चुनौती दी गई है। ये कानून जबरन, प्रलोभन या धोखे से किए गए धर्मांतरण को अपराध घोषित करते हैं, विशेष रूप से जब यह धर्मांतर विवाह के जरिए हो।
उत्तराखंड कानून के अनुसार, ऐसे धर्मांतरण के दोषियों को दो साल तक की सजा हो सकती है। इसमें नकद, रोजगार या अन्य लाभ को “प्रलोभन” माना गया है। वहीं, यूपी कानून केवल विवाह से जुड़े नहीं, बल्कि सभी धर्मांतरणों को नियंत्रित करता है और इसके लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि ये राज्य को किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप करने की शक्ति देते हैं।
अब यह मामला तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए जाएगा, जिसके बाद इन कानूनों की वैधता पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

