‘वक्फ सूची’ में शामिल नहीं संपत्तियों पर वक्फ ट्रिब्यूनल का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं: सुप्रीम कोर्ट

वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) के तहत गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने निर्धारित किया है कि वक्फ ट्रिब्यूनल किसी ऐसी संपत्ति के संबंध में केवल निषेधाज्ञा (Injunction) के वाद पर विचार नहीं कर सकता, जो अधिनियम के अध्याय II के तहत प्रकाशित ‘औकाफ की सूची’ (List of Auqaf) में निर्दिष्ट नहीं है या अध्याय V के तहत पंजीकृत नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने हबीब अलादीन और अन्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर वाद (Plaint) को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत खारिज कर दिया। न्यायालय ने रमेश गोबिंदराम बनाम सुगरा हुमायूं मिर्जा वक्फ (2010) के मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों की पुष्टि की और बाद के उन फैसलों से असहमति जताई जिन्होंने धारा 83 के दायरे पर अलग दृष्टिकोण अपनाया था।

कानूनी मुद्दा और निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र के विस्तार और दायरे से संबंधित था। विशेष रूप से यह तय करना था कि क्या ट्रिब्यूनल के पास उस संपत्ति के लिए निषेधाज्ञा देने का अधिकार है, जिसे ‘उपयोग द्वारा वक्फ’ (Waqf by user) होने का दावा किया गया है, लेकिन जिसे औकाफ की आधिकारिक सूची में अधिसूचित नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि, “यह निर्णय कि संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं, ट्रिब्यूनल द्वारा नहीं किया जा सकता क्योंकि संपत्ति ‘औकाफ की सूची’ में निर्दिष्ट नहीं है। वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 6(1) और धारा 7(1) के तहत ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पहले अपीलकर्ता के स्वामित्व वाली भूमि पर विकसित एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स से संबंधित है। प्रतिवादी, मोहम्मद अहमद ने दावा किया कि भवन के ग्राउंड फ्लोर पर एक क्षेत्र को बिल्डर द्वारा मालिक की भागीदारी के साथ मस्जिद के रूप में संलग्न किया गया था। यह दावा करते हुए कि वह और अन्य लोग 2008 से वहां नमाज अदा कर रहे हैं, प्रतिवादी ने 2021 में कथित मस्जिद तक पहुंच में बाधा डालने के खिलाफ अपीलकर्ताओं को रोकने के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष स्थायी निषेधाज्ञा (Perpetual Injunction) की मांग करते हुए एक मुकदमा दायर किया।

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अपीलकर्ताओं ने सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के तहत वाद को खारिज करने के लिए आवेदन दायर किया। उनका तर्क था कि संपत्ति वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत वक्फ नहीं थी क्योंकि कोई समर्पण (Dedication) या अधिसूचना नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि चूंकि संपत्ति ‘औकाफ की सूची’ में शामिल नहीं थी और न ही बोर्ड के साथ पंजीकृत थी, इसलिए ट्रिब्यूनल के पास मुकदमे पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।

ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट दोनों ने इस आवेदन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने पाया था कि वाद में किए गए दावे अधिनियम की धारा 3(r)(i) के तहत ‘उपयोग द्वारा वक्फ’ का संकेत देते हैं, जिसके बाद अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी. आर्यमा सुंदरम ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 6 और 7 ट्रिब्यूनल को यह निर्धारित करने का अधिकार तभी देती हैं जब संपत्ति धारा 5 के तहत ‘औकाफ की सूची’ में निर्दिष्ट हो। उन्होंने तर्क दिया कि गैर-अधिसूचित संपत्ति की स्थिति की घोषणा ट्रिब्यूनल के समक्ष नहीं की जा सकती और इसे सिविल कोर्ट में ले जाना होगा। इसके लिए मदानुरी श्री राम चंद्र मूर्ति बनाम सैयद जलाल (2017) और रमेश गोबिंदराम मामले का हवाला दिया गया।

प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी ने तर्क दिया कि धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल के पास “वक्फ से संबंधित किसी भी विवाद, प्रश्न या अन्य मामले” को निर्धारित करने की व्यापक शक्तियां हैं। उन्होंने अधिनियम में 2013 के संशोधन और राशिद वली बेग बनाम फरीद पिंडारी (2022) के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया था कि धारा 83 विवादों के पूरे स्पेक्ट्रम को कवर करती है।

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कोर्ट का विश्लेषण

फैसला लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने रमेश गोबिंदराम, डब्ल्यू.बी. वक्फ बोर्ड बनाम अनीस फातिमा बेगम, और राशिद वली बेग सहित कई पूर्व नजीरों की विस्तृत समीक्षा की।

रमेश गोबिंदराम की पुष्टि: कोर्ट ने कहा कि रमेश गोबिंदराम मामले में सही फैसला दिया गया था कि ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र केवल तभी उत्पन्न होता है जब संपत्ति औकाफ की सूची में निर्दिष्ट हो। पीठ ने कहा कि धारा 85 के तहत सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का बहिष्कार पूर्ण (Absolute) नहीं है, बल्कि उन मामलों तक सीमित है जिन्हें अधिनियम द्वारा ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित किया जाना आवश्यक है।

धारा 83 और अलग विचारों पर: कोर्ट ने अनीस फातिमा बेगम और राशिद वली बेग मामलों में अपनाई गई धारा 83 की व्यापक व्याख्या से असहमति जताई। पीठ ने स्पष्ट किया:

“हम धारा 83 को ट्रिब्यूनल को उन मामलों के संबंध में अधिकार क्षेत्र प्रदान करने वाला प्रावधान नहीं मान सकते, जिनके अलावा अधिनियम के अन्य प्रावधानों के तहत पहले से ही अधिकार क्षेत्र प्रदान किया गया है… धारा 83 अपने आप में ट्रिब्यूनल को कोई अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करती है… यह केवल राज्य द्वारा ट्रिब्यूनल के गठन को सक्षम बनाती है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राशिद वली बेग में अपनाई गई यह व्यापक राय कि धारा 83 वक्फ संपत्ति से संबंधित “किसी भी विवाद” को कवर करती है, वैधानिक योजना के विपरीत थी। जजों ने नोट किया कि धारा 83 में “इस अधिनियम के तहत” (Under this Act) शब्दों का अर्थ है कि संपत्ति को अधिनियम के तहत एक मान्यता प्राप्त स्थिति होनी चाहिए – या तो धारा 5(2) सूची के माध्यम से या धारा 37 रजिस्टर के माध्यम से।

2013 के संशोधन का प्रभाव: कोर्ट ने 2013 के संशोधन का विश्लेषण करते हुए कहा कि हालांकि इसने पंजीकृत संपत्तियों को शामिल करने के लिए ‘औकाफ की सूची’ की परिभाषा का विस्तार किया और धारा 54 के तहत बेदखली के लिए विशिष्ट शक्तियां प्रदान कीं, लेकिन इसने संपत्ति की स्थिति की घोषणा के संबंध में मुख्य अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को नहीं बदला।

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निर्णय

इन सिद्धांतों को तथ्यों पर लागू करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विषय संपत्ति न तो औकाफ की प्रकाशित सूची में थी और न ही अधिनियम के तहत पंजीकृत थी।

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “ट्रिब्यूनल के समक्ष मांगी गई सामान्य निषेधाज्ञा (Injunction Simpliciter) उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है और वाद को खारिज किया जाना चाहिए।”

अपील स्वीकार कर ली गई और ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर मुकदमा खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने इस सवाल को खुला छोड़ दिया कि क्या संपत्ति ‘उपयोग द्वारा वक्फ’ है या नहीं, जिसे सक्षम मंच (Competent Forum) के समक्ष कानून के अनुसार उठाया जा सकता है।

केस विवरण

  • केस का नाम: हबीब अलादीन और अन्य बनाम मोहम्मद अहमद
  • अपील संख्या: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (@ एसएलपी (सी) संख्या 2937 / 2022)
  • कोरम: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

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