सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि यदि आरक्षित श्रेणी (SC/ST/OBC) का कोई मेधावी उम्मीदवार क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) श्रेणी, जैसे कि दिव्यांगजन (PWD), से संबंध रखता है, तो वह उस विशिष्ट श्रेणी के लिए निर्धारित ‘अनारक्षित’ (Unreserved) पद पर नियुक्ति पाने का हकदार है, बशर्ते वह अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवार से अधिक मेधावी हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अनारक्षित PWD रिक्तियों को केवल अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों से ही भरा जाना चाहिए, चाहे अन्य श्रेणियों के PWD उम्मीदवार उनसे अधिक अंक क्यों न लाए हों।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड द्वारा ‘जूनियर इंजीनियर (सिविल) ग्रेड II’ के पदों पर भर्ती से जुड़ा है। विज्ञापन (सं. REC/2023/01) में कुल 30 रिक्तियों का उल्लेख था, जिनमें शामिल थे:
- 7 अनारक्षित (UR) पद, जिसमें 1 पद UR (PWD-LV) (कम दृष्टि/अंधापन) के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित था।
- 5 OBC-A पद।
भर्ती अधिसूचना में एक शर्त थी: “अनारक्षित (PWD-LV) श्रेणी में योग्य उम्मीदवार उपलब्ध न होने की स्थिति में, रिक्ति को योग्यता के अनुसार अन्य श्रेणियों के PWD उम्मीदवारों द्वारा भरा जाएगा।”
इस प्रक्रिया में, अनारक्षित श्रेणी के PWD-LV उम्मीदवार दीपेंदु बिस्वास (प्रतिवादी संख्या 1) ने 55.667 अंक प्राप्त किए। वहीं, OBC-A श्रेणी के उम्मीदवार प्रतिवादी संख्या 3, जो स्वयं भी PWD-LV श्रेणी से थे, ने 66.667 अंक प्राप्त किए। चूंकि प्रतिवादी संख्या 3 अपनी मूल OBC-A श्रेणी की सीटों में स्थान नहीं बना पाए थे, इसलिए विभाग ने अधिक मेधावी होने के कारण उन्हें UR (PWD-LV) पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव दिया।
कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के निर्णय को पलटते हुए कहा था कि चूंकि एक “योग्य” अनारक्षित उम्मीदवार (बिस्वास) उपलब्ध था, इसलिए यह रिक्ति किसी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को नहीं दी जा सकती।
न्यायालय का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने ऊर्ध्वाधर (Vertical) और क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण की प्रकृति का विश्लेषण किया और इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ तथा सौरव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया।
1. ‘अनारक्षित’ श्रेणी की परिभाषा
पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘अनारक्षित’ या ‘ओपन’ श्रेणी कोई सामाजिक या सांप्रदायिक कोटा नहीं है। कोर्ट ने कहा:
“यह केवल विभिन्न आरक्षण श्रेणियों के तहत पदों के निर्धारण के बाद शेष बची रिक्तियों को दर्शाता है… ‘अनारक्षित’ श्रेणी के तहत किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए योग्यता (Merit) एक अनिवार्य और अभिन्न गुण है।”
2. अनारक्षित श्रेणी में क्षैतिज आरक्षण
न्यायालय ने पाया कि जब अनारक्षित श्रेणी पर क्षैतिज आरक्षण (जैसे PWD-LV) लागू होता है, तो वह उन सभी उम्मीदवारों के लिए एक “खुला क्षेत्र” बन जाता है जिनके पास वह विशिष्ट दिव्यांगता है, चाहे उनकी सामाजिक श्रेणी (SC/ST/OBC) कुछ भी हो। कोर्ट के अनुसार:
“अनारक्षित श्रेणी के तहत विशेष (क्षैतिज) आरक्षण के लिए निर्धारित पद उस विशेष आरक्षण की विशेषता रखने वाले प्रत्येक उम्मीदवार के लिए खुला होगा।”
3. गतिशीलता (Mobility) का सिद्धांत
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि योग्यता के आधार पर आरक्षित श्रेणी से अनारक्षित स्लॉट में जाना एक स्थापित कानूनी स्थिति है। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यदि अनारक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार (PWD-LV) किसी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार (PWD-LV) से योग्यता में कम पाया जाता है, तो अनारक्षित श्रेणी वाला व्यक्ति अधिक मेधावी उम्मीदवार पर बढ़त हासिल नहीं कर सकता क्योंकि यह योग्यता (Merit) के सिद्धांत के विरुद्ध होगा।”
हाईकोर्ट की खंडपीठ की व्याख्या को कोर्ट ने “स्पष्ट रूप से मनमाना” और “संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के खंड के विपरीत” बताया।
4. छूट (Relaxation) संबंधी शर्त
पीठ ने दोहराया कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार अनारक्षित पद पर दावा करता है, तो उसने आरक्षित श्रेणियों के लिए दी जाने वाली किसी विशेष छूट (जैसे आयु या अनुभव) का लाभ न लिया हो। दीपा ई.वी. बनाम भारत संघ का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि इस मामले में प्रतिवादी संख्या 3 ने ऐसी किसी छूट का लाभ नहीं लिया था।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भर्ती अधिसूचना की शर्त को समझने में भूल की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिसूचना में “अनुपलब्धता” संबंधी नोट केवल एक सामान्य तथ्य का उल्लेख था और वह अनारक्षित श्रेणियों में योग्यता के संवैधानिक सिद्धांत को खत्म नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा:
“अनारक्षित श्रेणी के PWD-LV पदों के लिए सभी PWD-LV उम्मीदवार समान हैं और उनके अधिकार एक जैसे हैं, भले ही वे अलग-अलग सामाजिक श्रेणियों से हों। उनमें से जो सबसे मेधावी है, उसे ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ के 07.05.2024 के आदेश को रद्द कर दिया और एकल पीठ के उस निर्णय को बहाल कर दिया जिसने रिट याचिका को खारिज किया था।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: द वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन को. लि. एवं अन्य बनाम दीपेंदु बिस्वास एवं अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 10262/2025
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- दिनांक: 07 अप्रैल, 2026

