फोन टैपिंग मामला: सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के पूर्व SIB प्रमुख टी. प्रभाकर राव को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तेलंगाना के विशेष खुफिया ब्यूरो (SIB) के पूर्व प्रमुख टी. प्रभाकर राव को फोन टैपिंग मामले में गिरफ्तारी जैसी किसी भी ज़बरदस्ती की कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने निर्देश दिया कि राव को उनका पासपोर्ट वापस दिया जाए और उन्हें जांच अधिकारी के समक्ष पेश होना होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने राव से यह शपथपत्र लेने का भी आदेश दिया कि वह पासपोर्ट प्राप्त होने के तीन दिनों के भीतर भारत लौट आएंगे।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने राव की अग्रिम ज़मानत याचिका का विरोध किया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 अगस्त की तारीख तय की है।

राव ने यह याचिका तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की थी, जिसमें उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका को खारिज कर दिया गया था।

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इससे पहले 22 मई को हैदराबाद की एक अदालत ने राव के खिलाफ उद्घोषणा आदेश (Proclamation Order) जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि यदि वह 20 जून तक अदालत में पेश नहीं होते हैं, तो उन्हें “घोषित अपराधी” (Proclaimed Offender) घोषित किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उनकी संपत्ति जब्त करने की कार्यवाही भी शुरू हो सकती है।

फोन टैपिंग मामले में मार्च 2024 से अब तक SIB के चार अधिकारियों को हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जिनमें एक निलंबित डिप्टी एसपी भी शामिल हैं। उन पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से खुफिया जानकारी मिटाने और पूर्ववर्ती BRS सरकार के दौरान फोन टैपिंग करने के आरोप लगे हैं। बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई थी।

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पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने SIB की संसाधनों का दुरुपयोग करते हुए विभिन्न क्षेत्रों के नागरिकों की निगरानी की, और यह निगरानी राजनीतिक लाभ के लिए की गई। उन्होंने कई लोगों की प्रोफाइलिंग बिना अनुमति के की और खुफिया ब्यूरो में गोपनीय और अवैध रूप से उन्हें ट्रैक किया गया। आरोप है कि इन गतिविधियों को एक विशेष राजनीतिक दल के हित में अंजाम दिया गया और अपराध के साक्ष्य मिटाने के लिए रिकॉर्ड भी नष्ट किए गए।

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सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम राहत से फिलहाल प्रभाकर राव को गिरफ्तारी से बचाव मिला है, लेकिन इस मामले में खुफिया तंत्र के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर गंभीर कानूनी सवाल अब भी अदालत के सामने बने हुए हैं।

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