कर्मचारी मुआवजा अधिनियम: नियोक्ता की चूक पर बीमा कंपनी से जुर्माना नहीं वसूला जा सकता – सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (EC Act) की धारा 4A(3)(b) के तहत लगाया गया जुर्माना भरने के लिए बीमा कंपनी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने कहा कि बीमा कंपनी केवल मुआवजे की राशि और उस पर लगने वाले ब्याज की भरपाई के लिए बाध्य है, लेकिन देरी के कारण लगाया गया जुर्माना नियोक्ता की व्यक्तिगत गलती का परिणाम है, जिसे उसे स्वयं ही भुगतना होगा।

अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड पर मुआवजे और ब्याज के अलावा 35% जुर्माना (₹2,57,838) भी अदा करने का भार डाल दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला संदीप नाम के एक कमर्शियल ड्राइवर की मृत्यु से जुड़ा है, जो प्रतिवादी संख्या 4, मनोज कुमार के यहाँ कार्यरत थे। 13 फरवरी, 2017 को संदीप की गाड़ी चलाते समय तबीयत बिगड़ी और अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके कानूनी उत्तराधिकारियों (प्रतिवादी 1-3) ने मुआवजे के लिए दावा याचिका दायर की।

लेबर कमिश्नर ने नियोक्ता-कर्मचारी संबंध को सही पाया और ₹7,36,680 का मुआवजा 12% ब्याज के साथ मंजूर किया। चूंकि नियोक्ता ने देय तिथि के एक महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान नहीं किया था, इसलिए कमिश्नर ने उन पर 35% का जुर्माना भी लगाया। हालांकि, जब मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा, तो हाईकोर्ट ने नियोक्ता के बजाय बीमा कंपनी को मुआवजे, ब्याज और जुर्माने की पूरी राशि का भुगतान करने का निर्देश दे दिया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (बीमा कंपनी) की ओर से दलील दी गई कि धारा 4A(3)(b) के तहत जुर्माना नियोक्ता की “व्यक्तिगत गलती और लापरवाही” का परिणाम है। वेद प्रकाश गर्ग बनाम प्रेमी देवी (1997) मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि बीमा कंपनी केवल मुख्य मुआवजे और ब्याज के लिए जिम्मेदार है, जुर्माने के लिए नहीं।

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प्रतिवादी (दावेदार) की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 4A में नियोक्ता और बीमाकर्ता की जिम्मेदारी के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है। उनके अनुसार, बीमा कंपनी ने नियोक्ता के स्थान पर कदम रखा है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी “संयुक्त और पृथक” (Joint and Several) है।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 4A के विधायी इतिहास का विश्लेषण करते हुए कहा कि 1995 के संशोधन के बाद मुआवजे और ब्याज (खंड ‘A’) को जुर्माने (खंड ‘B’) से अलग कर दिया गया है।

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अदालत ने टिप्पणी की:

“जुर्माने के हिस्से को अलग करने के पीछे विधायी मंशा उन क्षतिपूर्ति करने वालों (बीमा कंपनियों) के बोझ को कम करना था, जो जुर्माने के भुगतान से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहे थे… जबकि जुर्माने का यह अतिरिक्त भार नियोक्ता द्वारा निर्धारित एक महीने की अवधि में भुगतान न करने के कारण उत्पन्न हुआ था।”

पीठ ने आगे कहा कि यदि बीमा कंपनियों को जुर्माना भरने के लिए मजबूर किया गया, तो नियोक्ताओं के लिए समय पर मुआवजा जमा करने का कोई डर नहीं रह जाएगा और यह वैधानिक दायित्व केवल एक “मृत पत्र” (Dead Letter) बनकर रह जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने वेद प्रकाश गर्ग बनाम प्रेमी देवी (1997) 8 SCC 1 के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा:

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“जहां तक बीमाकृत नियोक्ता पर लगाए गए जुर्माने की राशि का संबंध है… चूंकि यह किसी उचित कारण के बिना बीमाकृत की व्यक्तिगत गलती के कारण है, इसलिए बीमा कंपनी को जुर्माने के उस हिस्से की भरपाई के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता।”

कोर्ट ने अपने हालिया फैसले शीला देवी बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2025) का भी उल्लेख किया।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के 21 मई, 2025 के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जहां उसने बीमा कंपनी पर जुर्माने की देयता डाली थी। अदालत ने नियोक्ता (प्रतिवादी संख्या 4) को आदेश दिया कि वह 8 सप्ताह के भीतर ₹2,57,838 की जुर्माने की राशि जमा करे। मुआवजे और ब्याज से संबंधित अन्य निष्कर्षों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

  • केस का नाम: न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 174/2026

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