सुप्रीम कोर्ट: सुसाइड पैक्ट में भागीदारी ‘उकसाने’ के बराबर, जीवित बचा साथी धारा 306 के तहत दोषी; अभिनेत्री प्रत्युषा मौत मामले में सजा बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 में दक्षिण भारतीय अभिनेत्री सुश्री प्रत्युषा की मौत से जुड़े मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए गुडीपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘सुसाइड पैक्ट’ (आत्महत्या का समझौता) में शामिल होना और उस पर अमल करना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 107 के तहत ‘उकसाने’ (Instigation) की श्रेणी में आता है।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने आरोपी द्वारा दायर अपील और मृतka की मां द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (रिविजन पिटीशन) दोनों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पुष्टि की कि यह मामला जहर खाकर आत्महत्या के समझौते (सुसाइड पैक्ट) का परिणाम था, न कि हत्या या गला घोंटने का।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना फरवरी 2002 की है। अभिनेत्री प्रत्युषा और आरोपी (जो उस समय इंजीनियरिंग का छात्र था) के बीच करीब एक दशक से प्रेम संबंध थे। जहां प्रत्युषा की मां, श्रीमती सरोजिनी देवी (PW-1) शादी के लिए सहमत थीं, वहीं आरोपी के माता-पिता इसके खिलाफ थे।

23 फरवरी 2002 को, दोनों मिले और बाद में जहर का सेवन करने के बाद बंजारा हिल्स स्थित केयर अस्पताल में भर्ती हुए। 24 फरवरी 2002 को प्रत्युषा की मृत्यु हो गई, जबकि आरोपी बच गया और 9 मार्च 2002 को उसे छुट्टी दे दी गई। अभियोजन पक्ष का कहना था कि शादी के विरोध के कारण दोनों ने सुसाइड पैक्ट किया था। आरोपी ने कथित तौर पर ‘नुवाक्रॉन’ कीटनाशक और एक चाकू खरीदा, जहर को कोका-कोला में मिलाया और दोनों ने इसका सेवन किया।

विवाद: गला घोंटना बनाम जहर

फैसले में विरोधाभासी चिकित्सा राय पर विस्तार से चर्चा की गई। पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. बी. मुनि स्वामी ने राय दी थी कि मौत का कारण “मैनुअल स्ट्रैंगुलेशन (हाथ से गला घोंटना) के कारण श्वासरोध” था और यौन हमले का सुझाव भी दिया था। उन्होंने रिपोर्ट सौंपने से पहले ही मीडिया में बयान भी दे दिए थे।

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हालांकि, सीबीआई, आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति और एम्स (AIIMS), नई दिल्ली के मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई बाद की जांचों में सर्वसम्मति से निष्कर्ष निकाला गया कि मौत ऑर्गेनोफॉस्फेट विषाक्तता (Organophosphate poisoning) के कारण हुई थी।

कोर्ट में दलीलें

आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है जो संदेह से परे साबित नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि जहर की खरीद स्थापित नहीं हुई थी, टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) में खामियां थीं, और डॉक्टर के पास दर्ज मृतka के मृत्युकालिक बयान (Dying Declaration) में केवल कीटनाशक खाने की बात कही गई थी, जिससे आरोपी पर आरोप साबित नहीं होता।

इसके विपरीत, मृतका की मां के वकील ने तर्क दिया कि यह बलात्कार और गला घोंटकर हत्या का मामला था। उन्होंने प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शरीर पर कथित चोटों का हवाला दिया।

सीबीआई ने तर्क दिया कि एफएसएल (FSL) रिपोर्ट सहित प्रत्यक्षदर्शी और चिकित्सा साक्ष्य निर्णायक रूप से जहर खाने की पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा कि आरोपी ने कीटनाशक खरीदा था और घटना के बारे में सीआरपीसी (CrPC) की धारा 313 के तहत अपने बयान में चुप्पी साधे रखी, जिससे प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकलता है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

1. हत्या और बलात्कार की थ्योरी खारिज: कोर्ट ने गला घोंटने और बलात्कार के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। इलाज करने वाले डॉक्टरों और विशेषज्ञ समितियों की गवाही पर भरोसा करते हुए, पीठ ने नोट किया कि अस्पताल में भर्ती होने पर मृतका होश में थी और बातचीत कर रही थी, जो चिकित्सकीय रूप से गला घोंटने की स्थिति में संभव नहीं है।

कोर्ट ने कहा:

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“इन तथ्यों को एक साथ देखने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मृतका भर्ती के समय होश में थी, उसके शरीर पर गला घोंटने के कोई निशान नहीं थे और उसने स्वयं जहर खाने का खुलासा किया था। इसलिए गला घोंटकर मारने का तर्क खारिज किया जाता है।”

बलात्कार के आरोप के संबंध में, कोर्ट ने नोट किया कि एपी एफएसएल और सीएफएसएल की अलग-अलग रिपोर्टों में वीर्य (Semen) का पता नहीं चला था।

2. डॉ. बी. मुनि स्वामी के खिलाफ सख्त टिप्पणी: कोर्ट ने समय से पहले और गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी करने और प्रेस में जाने के लिए डॉ. बी. मुनि स्वामी के “गलत और गैर-पेशेवर” आचरण के लिए सख्त आलोचना की।

पीठ ने टिप्पणी की:

“न्यायालय इस बात पर जोर देता है कि बहुमत की भावना या सार्वजनिक दबाव का पालन करने से न्याय नहीं होता… नतीजतन, यह न्यायालय मानता है कि डॉ. मुनि स्वामी का गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करना, उसे समय से पहले प्रचारित करना और इस प्रकार पेशेवर नैतिकता और सब ज्यूडिस नियम का उल्लंघन करना न्यायालय की अवमानना है।”

3. सुसाइड पैक्ट और दुष्प्रेरण (Abetment): कोर्ट ने सुसाइड पैक्ट में बचे हुए व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी तय की। पीठ ने कहा कि समझौते में आरोपी की भागीदारी उसे आईपीसी की धारा 107 (दुष्प्रेरण) के तहत दोषी बनाती है।

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कोर्ट ने कहा:

“सुसाइड पैक्ट में, यह निहित है कि प्रत्येक भागीदार दूसरे के कृत्य करने के इरादे को जानता है और यह भी जानता है कि यदि वह पीछे हटता है तो संभवतः दूसरा भी रुक जाएगा। इसलिए, प्रत्येक पक्ष का कृत्य करने का संकल्प दूसरे पक्ष की भागीदारी के कारण और भी दृढ़ और मजबूत हो जाता है।”

4. प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference): कोर्ट ने नोट किया कि चूंकि मृतका अब जीवित नहीं है, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत परिस्थितियों को स्पष्ट करने की जिम्मेदारी आरोपी पर थी। हालांकि, सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अपने बयान में, आरोपी ने अस्पताल में भर्ती होने या मृतका के साथ संबंध होने से भी इनकार कर दिया, जबकि इसके विपरीत भारी सबूत मौजूद थे। कोर्ट ने माना कि आरोपी द्वारा स्पष्टीकरण के अभाव में यह प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाएगा कि जहर आत्महत्या के इरादे से खाया गया था।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने गुडीपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी द्वारा दायर अपील और मृतका की मां द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया। कोर्ट ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया।

केस विवरण:

केस टाइटल: गुडीपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी बनाम स्टेट सी.बी.आई. (संबद्ध मामलों के साथ)

केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 457/2012

पीठ: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन

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