“वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के विपरीत भारत में टूटते पारिवारिक संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने देश में परिवार नामक संस्था की गिरती एकता पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि “वसुधैव कुटुम्बकम” जैसी भारतीय परंपरा की भावना के बावजूद, आज के समय में निकट संबंधियों के बीच भी कलह बढ़ती जा रही है।

न्यायमूर्ति पंकज मित्थल और न्यायमूर्ति एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि भारत अब “एक व्यक्ति, एक परिवार” की ओर बढ़ रहा है, जो हमारे साझा पारिवारिक मूल्यों और व्यापक बंधुत्व की अवधारणा के विपरीत है।

यह टिप्पणी उस समय की गई जब कोर्ट एक महिला द्वारा अपने सबसे बड़े बेटे को संपत्ति से बेदखल करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो पारंपरिक पारिवारिक ढांचे के टूटने का एक उदाहरण बन गई है।

यह मामला कल्लू मल और उनकी पत्नी समतोला देवी से जुड़ा है, जिनके अपने बेटों, खासकर सबसे बड़े बेटे से रिश्ते तनावपूर्ण हो गए थे। विवाद तब और गहरा गया जब पिता की बीमारी के दौरान बेटे ने पारिवारिक व्यापार और संपत्ति पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद माता-पिता ने पहले बेटों से भरण-पोषण की मांग की, जो अदालत द्वारा स्वीकृत हुई, और फिर वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के तहत बड़े बेटे को घर से निकालने की याचिका दायर की।

इस मामले में पारिवारिक अदालत के निर्णयों के खिलाफ कई अपीलें दायर हुईं, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया, और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। शीर्ष अदालत ने कहा कि कल्लू मल अब संपत्ति के एकमात्र मालिक नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने इसका कुछ हिस्सा अपनी बेटियों और अन्य को हस्तांतरित कर दिया है, जिससे बेटे को बेदखल करने का आदेश कानूनी रूप से जटिल हो गया।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे पारिवारिक मामलों में संपत्ति और रिश्तों के टकराव के कारण स्थिति संवेदनशील और जटिल हो जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बेहतर समाधान यह हो सकता है कि भरण-पोषण जैसे वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाए, न कि सीधे बेदखली जैसे कठोर कदमों पर।

अदालत की यह टिप्पणी बदलते सामाजिक ढांचे और परिवारों में बढ़ते टकराव पर गंभीर आत्मचिंतन का आह्वान करती है, खासकर उस देश में जहां “पूरा संसार एक परिवार है” की भावना हजारों वर्षों से सांस्कृतिक मूल्यों का आधार रही है।

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