यौन उत्पीड़न मामलों में अदालतों की ‘असंवेदनशील टिप्पणियों’ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, व्यापक दिशानिर्देश जारी करने पर विचार; इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश स्थगित

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संकेत दिया कि वह देशभर की अदालतों के लिए व्यापक दिशानिर्देश तय कर सकता है, ताकि यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में टिप्पणियां और आदेश देते समय असंवेदनशील भाषा या विचारों का प्रयोग न हो, क्योंकि ऐसी टिप्पणियां पीड़िताओं, उनके परिवारों और समाज पर “चिलिंग इफेक्ट” डाल सकती हैं और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च के आदेश में की गई टिप्पणियों पर स्वत: संज्ञान लेकर शुरू किया था। सुनवाई के दौरान वकीलों ने बताया कि हाल के दिनों में विभिन्न हाईकोर्ट और निचली अदालतों में भी इस तरह की मौखिक और लिखित टिप्पणियों के उदाहरण सामने आए हैं।

सीनियर अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि हाल ही में एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रात में घटना होने को “आमंत्रण” जैसा माना। उन्होंने कहा कि कोलकाता और राजस्थान हाईकोर्ट में भी ऐसे मामले आए हैं। एक अन्य वकील ने बताया कि सोमवार को एक निचली अदालत में इन-कैमरा सुनवाई के बावजूद कई लोग मौजूद थे और पीड़िता को कथित तौर पर डराया-धमकाया गया।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “ऐसी टिप्पणियां पीड़ितों को शिकायत वापस लेने के लिए मजबूर करने का माध्यम भी बन सकती हैं और समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। हम ऐसे मामलों को लेकर व्यापक दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करेंगे।” अदालत ने वकीलों से अगली तारीख से पहले संक्षिप्त लिखित सुझाव देने को कहा।

यह मामला उस घटना से जुड़ा है जिसमें तीन आरोपियों ने कथित रूप से एक महिला और उसकी 14 वर्षीय बेटी को रोका, नाबालिग के शरीर से छेड़छाड़ की, उसके कपड़े की डोरी तोड़ी और उसे culvert के नीचे ले जाने का प्रयास किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि यह कृत्य ‘बलात्कार के प्रयास’ की मंशा दर्शाने के लिए पर्याप्त नहीं है और इस आधार पर उसने आईपीसी की धारा 376/511 के स्थान पर कम दंडनीय धारा 354B के तहत आरोप तय करने को कहा था, जिसमें तीन से सात साल तक की सजा का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज स्पष्ट किया कि वह हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करेगा और मुकदमे को कठोर धाराओं के तहत आगे बढ़ने देगा। पीड़िता के हितों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि यदि ट्रायल कोर्ट समन जारी करता है तो आरोपी को आईपीसी की धारा 376, 511 और पॉक्सो के तहत तलब किया जाए और हाईकोर्ट के निष्कर्षों से प्रभावित न हुआ जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश आरोपियों के दोष या निर्दोष होने के संकेत नहीं हैं।

पीठ को यह भी बताया गया कि आरोपी को दो बार नोटिस दिए गए लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं हुए। वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फूलका ने कहा कि आरोपी नियमित रूप से ट्रायल कोर्ट में उपस्थित हो रहे हैं और मामले की जानकारी है। सुप्रीम कोर्ट ने SHO को सूचना भेजने का निर्देश दिया और अगली तारीख पर आरोपियों को उपस्थित होने का विकल्प दिया, साथ ही कहा कि अगली तारीख पर सेवा से जुड़े कारणों पर स्थगन नहीं दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला “We the Women of India” समूह द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र के आधार पर स्वत: संज्ञान में लिया था।

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इससे पहले 26 मार्च की सुनवाई में, जस्टिस बी आर गवई के नेतृत्व वाली पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों को “कानून की मूलभूत समझ से परे” और “अमानवीय दृष्टिकोण” करार दिया था।

अब कोर्ट सुझावों के आधार पर संभावित दिशानिर्देशों पर अगली सुनवाई में विचार करेगा।

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