घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संरक्षण अधिकारी नियुक्त करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण आदेश में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला और तहसील स्तर के अधिकारियों को संरक्षण अधिकारी के रूप में नामित करें।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों तथा महिला एवं बाल विकास या सामाजिक कल्याण विभागों के सचिवों को समन्वय कर यह कार्य छह सप्ताह के भीतर पूरा करने को कहा, जहां अब तक यह नियुक्ति नहीं की गई है।

संरक्षण अधिकारी की भूमिका घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा, भलाई और अधिकार सुनिश्चित करने में अहम मानी जाती है।

पीठ ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 की प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा:

“वे अधिनियम की धारा 11 के तहत अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए मीडिया के माध्यम से प्रावधानों का व्यापक प्रचार करें, सेवाओं के समन्वय को सुनिश्चित करें और अधिनियम के प्रावधानों को लागू करें।”

साथ ही, कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि वे सेवा प्रदाताओं, स्वयं सहायता समूहों और संकटग्रस्त महिलाओं के लिए आश्रय गृहों की उपलब्धता सुनिश्चित करें। इसके अतिरिक्त, अधिनियम के तहत उपयोग के लिए उपयुक्त आश्रय गृहों की पहचान और नामांकन करने को भी कहा गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत नि:शुल्क कानूनी सहायता पाने का अधिकार है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को निर्देश दिया गया कि वह सभी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को इस संबंध में जागरूकता फैलाने को कहे।

“यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि कोई महिला कानूनी सहायता या सलाह की मांग करती है, तो उसे शीघ्र प्रदान किया जाना चाहिए, क्योंकि अधिनियम के तहत हर महिला को यह अधिकार प्राप्त है,” कोर्ट ने टिप्पणी की।

यह आदेश ‘वी द वीमेन ऑफ इंडिया’ नामक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसकी ओर से अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पक्ष रखा। याचिका में अधिनियम लागू होने के 15 साल बाद भी बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कर्मचारियों और आश्रय गृहों की भारी कमी की ओर ध्यान दिलाया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को महिलाओं के लिए समर्थन और जवाबदेही की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है, जिससे घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य ज़मीन पर वास्तविक रूप से लागू हो सके।

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