सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को झारखंड के एक वकील को निर्देश दिया कि वह झारखंड हाईकोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी मांगे। यह मामला अदालत की एक वायरल वीडियो क्लिप से जुड़ा है, जिसमें वकील ने कथित तौर पर हाईकोर्ट के एक जज से कहा था, “सीमा मत लांघिए” (Don’t cross the limit)।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने अधिवक्ता महेश तिवारी की याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें हाईकोर्ट की उस पांच-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष माफीनामा दाखिल करने की स्वतंत्रता दी, जिसने पिछले साल अक्टूबर में उनके खिलाफ अवमानना (Contempt) का नोटिस जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह वकील की माफी पर “सहानुभूतिपूर्वक” विचार करे।
क्या है पूरा मामला: बिजली कनेक्शन और वायरल बहस
यह विवाद पिछले साल 16 अक्टूबर का है, जब झारखंड हाईकोर्ट में जस्टिस राजेश कुमार के समक्ष एक मामले की सुनवाई चल रही थी। अधिवक्ता महेश तिवारी एक मुवक्किल की ओर से पेश हुए थे जो बिजली कनेक्शन की बहाली की मांग कर रहा था।
वकील ने अपने मुवक्किल की ओर से 25,000 रुपये जमा करने की पेशकश की, लेकिन अदालत ने नजीरों (precedents) का हवाला देते हुए कहा कि कुल बकाया का 50 प्रतिशत जमा करना आवश्यक है। हालांकि मामला अंततः 50,000 रुपये जमा करने पर सुलझ गया, लेकिन बहस खत्म होने के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
जस्टिस कुमार ने वकील के बहस करने के तरीके पर कुछ टिप्पणियां कीं और झारखंड स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष को उनके आचरण का संज्ञान लेने को कहा। इसके जवाब में, वकील ने कथित तौर पर पीठ से कहा कि वह “अपने तरीके से बहस करेंगे” और जज से कहा, “सीमा मत लांघिए।”
इस कार्यवाही का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद, तत्कालीन चीफ जस्टिस और चार अन्य जजों वाली हाईकोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया और वकील को अवमानना नोटिस जारी किया।
“आंखें दिखानी हैं तो वहां दिखाएं”: सीजेआई की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि वकील “अत्यंत पश्चातापी” हैं और बिना शर्त माफी मांगने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का इरादा माननीय जज का अनादर करना या न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालना नहीं था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वकील के आचरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। सीजेआई सूर्यकांत ने वकील के अड़ियल रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“वह जजों के सामने यह बात क्यों नहीं बता सकते? यह उनका अड़ियल चरित्र (Obstinate Character) है। उन्हें उनका सामना करने दीजिए… उन्हें समझाने दीजिए। अगर वह वहां आंखें दिखाना चाहते हैं… तो उन्हें दिखाने दीजिए और फिर हम देखेंगे। हम जानते हैं कि इससे कैसे निपटना है।”
जस्टिस जोयमाल्य बागची ने भी अदालती शिष्टाचार (Courtroom Decorum) के गिरते स्तर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “न्यायपालिका के हर स्तर पर… ऐसे मुद्दे हैं जहां घर्षण (Friction) पैदा करना पेशेवर गर्व का विषय बन जाता है।”
“वीडियो कार्यवाही एक मुसीबत बन गई है”
लाइव-स्ट्रीमिंग के वकीलों पर प्रभाव को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि अदालती कार्यवाही के डिजिटल प्रसारण ने बार के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
दवे ने कहा, “अदालती सुनवाई की ये वीडियो कार्यवाही एक मुसीबत (Menace) बन गई है। वकील के लिए एक नोटिस ही उसका करियर बर्बाद करने के लिए काफी है।”
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
शीर्ष अदालत ने इस बात को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता पश्चाताप कर रहा है, उसे अवमानना नोटिस का जवाब देने और हाईकोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी का हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने की अनुमति दे दी।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हम हाईकोर्ट से अनुरोध करते हैं कि वह माफी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे।”

