“जमानत याचिकाओं पर लंबी तारीखें मिलना बेहद निराशाजनक”: सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से मांगी लंबित मामलों की रिपोर्ट, रोस्टर बदलने के दिए संकेत

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान लंबी तारीखें दिए जाने पर “घोर निराशा” व्यक्त की है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को इस तरह से टाला जाना चिंताजनक है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जमानत सुनवाई में बार-बार स्थगन (Adjournment) के एक “पैटर्न” को उजागर करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन-जजों की पीठ ने जमानत मामलों के समयबद्ध निपटान के लिए कई कड़े निर्देश जारी किए हैं।

शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह के भीतर लंबित अग्रिम जमानत, नियमित जमानत और सजा के निलंबन की याचिकाओं का पूरा विवरण प्रस्तुत करें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सनी चौहान बनाम हरियाणा राज्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता को 11 अगस्त, 2025 को फरीदाबाद के सेक्टर-17 पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023, आर्म्स एक्ट और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 173 के संबंध में गिरफ्तार किया गया था।

याचिकाकर्ता ने नियमित जमानत के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 8 दिसंबर, 2025 को हुई सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने मामले को सीधे 20 फरवरी, 2026 के लिए स्थगित कर दिया, जो कि दो महीने से अधिक का अंतराल था। याचिकाकर्ता ने सुनवाई की तारीख पहले करने (Preponement) का अनुरोध किया, लेकिन 22 दिसंबर, 2025 को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि उसके सह-आरोपी की जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है। इस देरी से परेशान होकर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की।

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कोर्ट के समक्ष दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. पंकज नन्हेरा ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल के मामले में देरी कोई एक अकेली घटना नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि “पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट (चंडीगढ़) के समक्ष कई जमानत याचिकाएं लंबित हैं, जहां सुनवाई की अगली तारीखें महीनों बाद निर्धारित की जा रही हैं।”

अपने दावे को साबित करने के लिए, वरिष्ठ वकील ने उन जमानत याचिकाओं का एक चार्ट प्रस्तुत किया जो मई 2025 से लंबित हैं और उन्हें मार्च 2026 की तारीखें दी गई हैं। उन्होंने “अदालत-व्यापी पैटर्न” (Court-wide pattern) को प्रदर्शित करने के लिए कार्यवाही के रिकॉर्ड भी दिखाए।

कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने लंबी तारीखों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि हालांकि हाईकोर्ट पर मुकदमों का भारी बोझ है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पीठ ने अपने आदेश में कहा:

“इस स्तर पर हम केवल यही कहना चाहते हैं कि हम जिस तरह से व्यक्तियों की स्वतंत्रता से संबंधित प्रार्थनाओं (Prayers) से निपटा जा रहा है, उसे देखकर बेहद निराश हैं… विविध मामलों (miscellaneous matters) में, जमानत याचिका के भाग्य का फैसला करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता है।”

पीठ ने पटना हाईकोर्ट का भी जिक्र किया और कहा:

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“यह जानना भी उतना ही परेशान करने वाला है कि पटना हाईकोर्ट में, जमानत याचिकाएं महीनों तक प्रारंभिक सुनवाई के लिए भी सूचीबद्ध नहीं की जाती हैं।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तत्काल मामलों के निपटान के लिए समय-सीमा के संबंध में नियमित संकेत दिए जाने के बावजूद, हाईकोर्ट में वांछित संवेदनशीलता नहीं आई है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश

इस प्रणालीगत समस्या को हल करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. डेटा संग्रह: सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश दिया गया है कि वे अग्रिम जमानत, नियमित जमानत और सजा के निलंबन के लिए लंबित आवेदनों का पूरा विवरण भेजें। इसमें फाइलिंग की तारीख और सुनवाई की अगली तारीख शामिल होनी चाहिए।
    • यह विवरण 1 जनवरी, 2025 या उसके बाद दायर सभी आवेदनों के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
    • यदि इस तारीख से पहले दायर आवेदन अभी भी लंबित हैं, तो उनका विवरण भी दिया जाना चाहिए।
    • यह जानकारी चार सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी।
  2. राज्य सरकारों का सहयोग: सभी राज्य सरकारों को हाईकोर्ट के साथ पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया गया है।
    • राज्यों को जमानत याचिकाओं की सुनवाई के समय संबंधित जानकारी के साथ तैयार रहना चाहिए, बशर्ते कि उसकी एक प्रति महाधिवक्ता (Advocate General) या लोक अभियोजक (Public Prosecutor) के कार्यालय में कम से कम तीन दिन पहले जमा कर दी गई हो।
    • ऐसे मामलों में, जांच अधिकारियों (IO) या अधिकृत अधिकारियों को ऑनलाइन उपस्थित होने की अनुमति दी जा सकती है।
  3. आदेश का प्रसार: हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश को अपने हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के बीच परिचालित करें और उनसे “लंबित जमानत याचिकाओं का शीघ्र निपटान करने की अपील” करें।
  4. रोस्टर संशोधन: हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) से अपने रोस्टर और लिस्टिंग व्यवस्था पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया गया है।
    “जहां भी उन्हें लगता है कि कुल लंबित मामलों और ऐसे मामलों का फैसला करने के लिए आवंटित बेंच के बीच असंतुलन है, वे जमानत मामलों की लिस्टिंग के लिए रोस्टर का विस्तार कर सकते हैं।”

याचिकाकर्ता के मामले पर निर्णय

सनी चौहान के विशिष्ट मामले के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि जमानत याचिका 20 फरवरी, 2026 को सुनवाई के लिए निर्धारित है। कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज से अनुरोध किया कि यदि याचिकाकर्ता तारीख पहले करने की मांग करता है, तो मामले का फैसला गुण-दोष के आधार पर निर्धारित तारीख पर या उससे पहले किया जाए।

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हाईकोर्ट द्वारा प्रस्तुत डेटा की समीक्षा के लिए मामले को 23 मार्च, 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: सनी चौहान बनाम हरियाणा राज्य
  • केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 1613/2026

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