इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें आईपीएस अधिकारी शैलेश कुमार यादव पर 25,000 रुपये का अधिकतम जुर्माना लगाया गया था और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। शैलेश कुमार यादव उस समय गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (आरपीओ) और लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) के रूप में कार्यरत थे।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि आयोग की कार्रवाई “अत्यधिक जल्दबाजी” से प्रेरित थी और इसमें “पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण” दिखाई देता है, जो वस्तुनिष्ठ निर्णय के दायरे से बाहर था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2006 का है, जब एक आवेदक ने डुप्लिकेट पासपोर्ट और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं के संबंध में आरटीआई आवेदन दिया था। याचिकाकर्ता (शैलेश कुमार यादव) ने आवेदन को अग्रसारित किया था, लेकिन डिमांड ड्राफ्ट में तकनीकी कमी के कारण सहायक लोक सूचना अधिकारी (एपीआईओ) ने इसे वापस कर दिया था। बाद में आवेदन दोबारा जमा होने पर “की नंबर” और “फाइल नंबर” जैसी जानकारी मांगने के कारण सूचना देने में देरी हुई।
सूचना न मिलने से नाराज आवेदक ने सीआईसी में शिकायत दर्ज कराई। 8 फरवरी, 2007 को सीआईसी ने दंड की प्रक्रिया शुरू की और मुख्य पासपोर्ट अधिकारी को याचिकाकर्ता के खिलाफ “कठोरतम कार्रवाई” करने की सिफारिश की। इसके बाद 19 मार्च, 2007 को आयोग ने 25,000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए टिप्पणी की कि आवेदक के घर पुलिस भेजना “धमकाने और मानहानि” के समान है।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सी.बी. यादव ने तर्क दिया कि आयोग का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को अपना स्पष्टीकरण देने का मौका मिले बिना ही दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर दी गई। इसके अलावा, मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की जांच रिपोर्ट (21 मार्च, 2007) में स्पष्ट किया गया था कि देरी “कर्मचारियों की भारी कमी” और “काम के अत्यधिक बोझ” के कारण हुई थी, न कि किसी व्यक्तिगत अधिकारी की लापरवाही से।
प्रतिवादी (सीआईसी) के वकील: आयोग की ओर से तर्क दिया गया कि सूचना देने में 145 दिनों की देरी हुई थी। उन्होंने कहा कि बिना उचित कारण के देरी होने पर आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) के तहत जुर्माना अनिवार्य है। वकील ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का स्पष्टीकरण “खोखले बहानों और अपशब्दों” से भरा था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 20 के दायरे की जांच की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जुर्माना हर देरी के लिए नहीं लगाया जा सकता, बल्कि इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि अधिकारी ने “बिना किसी उचित कारण” या “दुर्भावनापूर्ण” तरीके से कार्य किया है।
पीठ ने टिप्पणी की:
“जांच रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अधिकतम मौद्रिक दंड लगाना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करना, प्रक्रियात्मक अनुचितता और मनमानेपन को दर्शाता है।”
कोर्ट ने सूचना आयुक्त द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा:
“ऐसी टिप्पणियां दर्शाती हैं कि आयोग ने मामले को वस्तुनिष्ठ तथ्यों के बजाय एक पूर्वाग्रहपूर्ण राय और याचिकाकर्ता के प्रति शत्रुतापूर्ण मानसिकता के साथ देखा।”
मनोहर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2012) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जोर दिया कि “केवल लापरवाही (Negligence per se)” धारा 20(2) के तहत कार्रवाई का आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने पाया कि देरी व्यक्तिगत नहीं बल्कि ढांचागत समस्याओं के कारण हुई थी।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 20 के तहत शक्तियों का प्रयोग “तर्कसंगत, आनुपातिक और निष्पक्ष जांच” के बाद ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने सीआईसी के आदेशों को अन्यायपूर्ण और मनमाना करार दिया।
अदालत ने कहा, “दोनों आदेशों में इस्तेमाल की गई भाषा आरटीआई अधिनियम के तहत वैधानिक चूक पर विचार करने के दायरे से कहीं आगे निकल गई है और इसमें निष्पक्षता की कमी झलकती है।”
नतीजतन, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई और 8 फरवरी व 19 मार्च 2007 के आदेशों को रद्द कर दिया गया।
केस विवरण:
- केस का नाम: शैलेश कुमार यादव आईपीएस बनाम भारत संघ और अन्य
- रिट याचिका संख्या: WRIT-C No. 27261 of 2007
- पीठ: न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी
- दिनांक: 27 फरवरी, 2026

