BNSS की धारा 183 के तहत बयान दोबारा दर्ज करना एक असाधारण उपाय, नियमित प्रक्रिया नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 183 के तहत पीड़ित का बयान दोबारा दर्ज करना कोई नियमित प्रक्रिया नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा केवल उन्हीं असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है जहाँ मूल बयान की सत्यता या उसकी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हों।

जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने एक पीड़ित द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में मजिस्ट्रेट के समक्ष दोबारा बयान दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता आजमगढ़ के थाना रानी की सराय में दर्ज केस अपराध संख्या 320/2024 में शिकायतकर्ता और पीड़ित है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 70(1) (यौन अपराध) सहित अन्य धाराओं के तहत दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए धारा 183 BNSS के तहत अपना बयान फिर से दर्ज कराने की मांग की थी। इससे पहले, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज (FTC), आजमगढ़ ने 13 जनवरी 2026 को अपने आदेश में कहा था कि धारा 183 के तहत बयान आमतौर पर केवल एक बार दर्ज किया जाता है और दोबारा बयान दर्ज करने का निर्देश केवल हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही दे सकता है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि मजिस्ट्रेट द्वारा उनका बयान सही ढंग से दर्ज नहीं किया गया था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने उनका बयान गलत तरीके से दर्ज किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि धारा 183 BNSS के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है, जिसके कारण बयान को दोबारा दर्ज करना आवश्यक है।

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वहीं, राज्य की ओर से पेश ए.जी.ए. ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि बयान दर्ज करते समय सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और याचिका में कोई ठोस आधार नहीं दिया गया है।

धारा 183 BNSS पर कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने BNSS की धारा 183 (जो पुरानी सीआरपीसी की धारा 164 के समकक्ष है) का विस्तृत विश्लेषण किया। बेंच ने कहा कि यह धारा बयान की स्वैच्छिकता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

कोर्ट ने कहा:

“BNSS की धारा 183 पुलिस जांच और ट्रायल के साक्ष्यों के बीच एक न्यायिक फिल्टर के रूप में कार्य करती है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण बयानों और इकबालिया बयानों को एक सुरक्षित और सत्यापन योग्य तरीके से दर्ज करना है ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके।”

दोबारा बयान दर्ज करने के मुद्दे पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“यह प्रावधान एक ही व्यक्ति के बार-बार बयान दर्ज करने की अनुमति नहीं देता है। धारा 183 के तहत बयान दर्ज करने का उद्देश्य साक्ष्य को उच्च विश्वसनीयता के साथ सुरक्षित करना है। कानून में एक ही व्यक्ति के बयान को बार-बार दर्ज करने का कोई वैधानिक अधिदेश नहीं है।”

कोर्ट ने आगे जोड़ा कि हाईकोर्ट अपनी असाधारण शक्तियों (अनुच्छेद 226/227 और धारा 528 BNSS) का उपयोग करके असाधारण मामलों में ही दोबारा बयान का आदेश दे सकता है—जैसे कि यदि बयान जबरन लिया गया हो या प्रक्रिया में कोई बड़ी चूक हुई हो।

पीड़ित के बयान पर कोर्ट का निष्कर्ष

कोर्ट ने आजमगढ़ के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष दर्ज पीड़ित के बयान की प्रमाणित प्रति का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि बयान पीड़ित के मौखिक बयान पर आधारित था और बयान दर्ज होने के बाद पीड़ित ने उसे पढ़ा और हस्ताक्षर किए थे।

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कोर्ट ने टिप्पणी की:

“मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया बयान स्पष्ट रूप से दिखाता है कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी दबाव के बयान दिया था और उसे पढ़ने के बाद ही हस्ताक्षर किए थे। सभी प्रक्रियात्मक पहलुओं का पालन किया गया है।”

खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि याचिकाकर्ता ऐसी कोई ‘असाधारण परिस्थिति’ साबित नहीं कर पाई हैं जिससे सामान्य नियम को बदलकर दोबारा बयान दर्ज करने का आदेश दिया जाए।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया और कहा कि मूल बयान की सत्यता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।

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अदालत ने कहा:

“दिए गए विश्लेषण के आलोक में, हमारा मानना है कि धारा 183 BNSS के तहत बयान को दोबारा दर्ज करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं है। अतः यह रिट याचिका मेरिट विहीन है और खारिज की जाती है।”

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