अदालतों में ‘वर्किंग सैटरडे’ (कार्य दिवस वाले शनिवार) के विरोध में चल रही वकीलों की हड़ताल पर गंभीर रुख अपनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वकीलों को हड़ताल करने या कार्य से विरत रहने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह के कृत्य वादकारियों (litigants) को बंधक बनाने जैसा है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने वकीलों की अनुपस्थिति में ही एक सजा स्थगन (Suspension of Sentence) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि विशेष रूप से उन मामलों में जहां व्यक्ति जेल में बंद है और मामला उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है, अदालत के कामकाज को रोका नहीं जा सकता।
‘वर्किंग सैटरडे’ के विरोध में कार्य बहिष्कार
अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया कि हाईकोर्ट की तीन बार एसोसिएशनों (दो मुख्य पीठ जोधपुर और एक जयपुर पीठ) ने हर महीने दो शनिवार को कार्य दिवस घोषित करने के फुल कोर्ट के निर्णय के विरोध में कार्य बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया है।
जस्टिस ढंड ने noted किया कि 23.01.2026 की वाद सूची (Cause List) में स्पष्ट नोट प्रकाशित किया गया था कि “उक्त शनिवारों को वकीलों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी” और केवल पुराने लंबित मामलों को स्वैच्छिक आधार पर लिया जाएगा। इसके बावजूद, वकीलों ने अदालती कामकाज का बहिष्कार जारी रखा।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: हड़ताल अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2003) का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार का आह्वान करने, यहां तक कि सांकेतिक हड़ताल करने का भी कोई अधिकार नहीं है।
जस्टिस ढंड ने सख्त शब्दों में कहा:
“वकीलों को हड़ताल पर जाने, बहिष्कार का आह्वान करने या सांकेतिक हड़ताल करने का कोई अधिकार नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कार्य से विरत रहने वाले वकील वादकारियों को बंधक (Ransom) बना लेते हैं। विशेष रूप से जेलों में बंद व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत के कामकाज को रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“जब वकील अदालतों का बहिष्कार करते हैं, तो यह सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत वादकारियों के त्वरित न्याय के अधिकारों का उल्लंघन करता है।”
अदालत ने विधायी मंशा का भी उल्लेख किया और कहा:
“एडवोकेट्स अमेंडमेंट बिल, 2025 में भी एक संशोधन प्रस्तावित किया गया है, जो वकीलों को अदालत के काम का बहिष्कार करने या उससे विरत रहने से प्रतिबंधित करता है।”
हालांकि कोर्ट ने माना कि असहमति और विरोध का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरपेक्ष (absolute) नहीं है। विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए और इससे न्याय के कार्य में बाधा नहीं आनी चाहिए। पीठ ने कहा, “विरोध के अधिकार को अन्य नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।”
वकीलों की गैर-मौजूदगी में दी राहत
यह कड़ी टिप्पणियां राजेश कुशवाह की याचिका पर सुनवाई के दौरान आईं, जो एनडीपीएस एक्ट के तहत 10 साल की सजा काट रहा है। यद्यपि हाईकोर्ट ने 07.10.2025 को ही उसकी सजा स्थगित कर दी थी, लेकिन वह जेल से बाहर नहीं आ सका क्योंकि वह गरीबी के कारण 1 लाख रुपये का जुर्माना भरने में असमर्थ था।
अदालत ने तय किया कि वकीलों की हड़ताल याचिकाकर्ता की स्वतंत्रता में बाधक नहीं बननी चाहिए और मामले का गुण-दोष के आधार पर निपटारा किया। सुप्रीम कोर्ट के सीबीआई बनाम अशोक सिरपाल (2024) के फैसले का सहारा लेते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि किसी गरीब आरोपी पर ऐसी शर्त थोपना जिसे वह पूरा करने में असमर्थ हो, अपील के अधिकार को विफल करता है और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा:
“गरीबी और दंड किसी आरोपी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा नहीं बनने चाहिए… यदि आवेदक, वर्तमान मामले में, जुर्माने की राशि की व्यवस्था करने की स्थिति में नहीं है… तो यह स्पष्ट रूप से उसके जीवन और स्वतंत्रता के व्यक्तिगत अधिकार का उल्लंघन है।”
बार काउंसिल को निर्देश
कोर्ट ने 1 लाख रुपये जमा कराने की शर्त को वापस लेते हुए अपीलकर्ता को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। महत्वपूर्ण रूप से, आदेश का समापन करते हुए, जस्टिस ढंड ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ राजस्थान को भेजी जाए ताकि “आवश्यक कदम उठाए जा सकें।”
केस टाइटल: राजेश कुशवाह बनाम राजस्थान राज्य
केस नंबर: एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस बेल (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) एप्लीकेशन नंबर 2204/2024 इन एस.बी. क्रिमिनल अपील (एसबी) नंबर 3151/2024

