पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जजों द्वारा फैसलों और कानूनी रिसर्च के लिए AI के इस्तेमाल पर लगाई रोक

न्यायिक विचार-प्रक्रिया की शुचिता और मौलिकता को बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के सभी न्यायिक अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे अदालती फैसलों को लिखने या कानूनी शोध (लीगल रिसर्च) के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स का उपयोग न करें।

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा सोमवार को जारी एक पत्र में स्पष्ट रूप से चैटजीपीटी (ChatGPT), जेमिनी (Gemini), कोपायलट (Copilot) और मेटा (Meta) जैसे लोकप्रिय AI प्लेटफार्मों का उल्लेख किया गया है। इस पत्र में साफ किया गया है कि ये निर्देश सीधे मुख्य न्यायाधीश की ओर से दिए गए हैं और इन निर्देशों का उल्लंघन करने पर “कड़ी कार्रवाई” की जाएगी।

यह निर्देश भारतीय न्यायपालिका के भीतर बढ़ रही उस चिंता को रेखांकित करता है, जिसमें कानूनी कार्यों को स्वचालित प्रणालियों (Automated Systems) को सौंपने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हाईकोर्ट का मानना है कि फैसलों के ड्राफ्ट और कानूनी रिसर्च में AI पर रोक लगाने से यह सुनिश्चित होगा कि अदालती परिणाम मानवीय विचार-विमर्श और पेशेवर विशेषज्ञता का ही परिणाम हों।

यह आदेश सभी जिला और सत्र न्यायाधीशों को भेजा गया है, जिन्हें अपने नियंत्रण में काम करने वाले न्यायिक अधिकारियों से इसका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी दी गई है।

AI पर कड़ा रुख अपनाने वाला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट देश का पहला कोर्ट नहीं है। हाल ही में, गुजरात हाईकोर्ट ने भी जिला न्यायपालिका के एक सम्मेलन के दौरान अपनी विस्तृत ‘AI पॉलिसी’ पेश की थी। उस नीति में किसी भी “महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया” के लिए AI के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिसमें शामिल हैं:

  • निर्णय लेना और न्यायिक तर्क देना
  • आदेशों का मसौदा तैयार करना और फैसला लिखना
  • जमानत और सजा से जुड़े विचार
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गुजरात हाईकोर्ट का रुख स्पष्ट करता है कि जहां न्याय वितरण की गति और प्रशासनिक गुणवत्ता सुधारने के लिए AI की मदद ली जा सकती है, वहीं यह कभी भी न्यायिक तर्क की मौलिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकता।

लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के बढ़ते चलन ने कानूनी पेशे में उनकी भूमिका पर वैश्विक बहस छेड़ दी है। हालांकि ये टूल्स डेटा के विशाल भंडार को संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन इनमें “मतिभ्रम” (Hallucinations) या गलत कानूनी संदर्भ देने का जोखिम रहता है। यदि अदालत में इनका अनियंत्रित उपयोग होता है, तो इससे न्याय की विफलता की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।

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इस ताजा आदेश के साथ ही पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट उन न्यायिक निकायों में शामिल हो गया है जो तकनीक और मानवीय विवेक के बीच एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींच रहे हैं।

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