IPC की धारा 498-A के तहत दोषसिद्धि ‘नैतिक अधमता’ का स्वत: आधार नहीं; पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बैंक मैनेजर की बर्खास्तगी रद्द की

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवाद से उपजी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A के तहत दोषसिद्धि को स्वचालित रूप से “नैतिक अधमता” (Moral Turpitude) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप मौदगिल ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक शाखा प्रबंधक की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक ने मामले के विशिष्ट तथ्यों या आचरण की प्रकृति का मूल्यांकन किए बिना यांत्रिक रूप से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।

हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के 15 दिसंबर, 2018 से सभी परिणामी लाभों (Consequential Benefits) को 6% वार्षिक ब्याज के साथ बहाल करें।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ब्रह्मजीत कौशल पानीपत में शाखा प्रबंधक (MMGS-III) के पद पर कार्यरत थे। मई 2000 में, उनकी पत्नी की आत्महत्या के बाद उनके और उनके परिवार के खिलाफ IPC की धारा 304-B, 406 और 498-A के तहत FIR दर्ज की गई थी। अक्टूबर 2002 में, सत्र न्यायालय ने याचिकाकर्ता को धारा 304-B (दहेज मृत्यु) और 406 के गंभीर आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन धारा 498-A (क्रूरता) के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।

इस दोषसिद्धि को 2018 में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने बरकरार रखा था। इसके परिणामस्वरूप, SBI ने 27 जून, 2019 को एक आदेश जारी कर याचिकाकर्ता को 14 दिसंबर, 2018 से सेवा से मुक्त कर दिया। बैंक ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स सर्विस रूल्स, 1992 के नियम 68(7)(i) और बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 10(1)(b)(i) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 498-A के तहत दोषसिद्धि “नैतिक अधमता” के दायरे में आती है।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि नियुक्ति प्राधिकारी यह बताने में विफल रहा कि वैवाहिक विवाद से जुड़ी दोषसिद्धि “नैतिक अधमता” की परिभाषा में कैसे आती है। यह तर्क दिया गया कि बैंक ने न तो ऐसे अपराधों की कोई सूची निर्धारित की थी और न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम पी. सुप्रमण्यन (2019) मामले में निर्धारित परीक्षणों को लागू किया। याचिकाकर्ता ने अपने बेदाग सेवा रिकॉर्ड और आपराधिक मामले के लंबित रहने के दौरान मिली पदोन्नति का भी हवाला दिया।

प्रतिवादियों की दलीलें: बैंक ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी कानूनी रूप से सही थी क्योंकि बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 10(1)(b)(i) ऐसे बैंक अधिकारी को सेवा में बने रहने से रोकती है जिसे नैतिक अधमता से जुड़े अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जे. रंगा राजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2019) के फैसले का हवाला देते हुए बैंक ने कहा कि महिला को प्रताड़ित करना और उसके साथ क्रूरता करना निश्चित रूप से नैतिक अधमता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस संदीप मौदगिल ने गौर किया कि “नैतिक अधमता” शब्द को बैंकिंग विनियमन अधिनियम या सेवा नियमों में परिभाषित नहीं किया गया है। पवन कुमार बनाम हरियाणा राज्य (1996) और इलाहाबाद बैंक बनाम दीपक कुमार भोला (1997) मामलों का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि नैतिक अधमता का तात्पर्य ऐसे आचरण से है जो स्वभावतः नीच, भ्रष्ट या नैतिकता के स्वीकृत मानकों के विपरीत हो।

बैंक के यांत्रिक दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“अनुशासनात्मक प्राधिकारी केवल ‘नैतिक अधमता से जुड़ी दोषसिद्धि’ वाक्यांश को दोहराकर सेवा समाप्त नहीं कर सकता। प्राधिकारी अपराध की प्रकृति, आधिकारिक कर्तव्यों के साथ इसके संबंध, परिस्थितियों, कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड और प्रस्तावित सजा की आनुपातिकता का मूल्यांकन करने के लिए बाध्य है।”

धारा 498-A के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने “गंभीर दहेज संबंधी क्रूरता” और वैवाहिक घर के भीतर “व्यक्तिगत विवादों” के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। हाईकोर्ट ने कहा:

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“धारा 498-A IPC के तहत किसी विशेष मामले का वर्गीकरण नैतिक अधमता के रूप में होगा या नहीं, यह उसके अपने तथ्यों पर निर्भर करता है… धारा 498-A के तहत हर मुकदमों को ‘समाज के खिलाफ अपराध’ के रूप में देखना और उसे नैतिक अधमता करार देना कानूनी जांच में टिक नहीं सकता।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को गंभीर आरोपों से बरी कर दिया गया था और धारा 498-A के तहत उसकी दोषसिद्धि वैवाहिक कलह से जुड़ी थी। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसा अपराध अपनी प्रकृति से “नैतिक अधमता” की श्रेणी में स्वतः नहीं आता।

बर्खास्तगी के आदेश को “अस्पष्ट और मनमाना” करार देते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार कर ली और 27 जून, 2019 के आदेश को रद्द कर दिया।

केस विवरण

  • केस शीर्षक: ब्रह्मजीत कौशल बनाम भारत संघ एवं अन्य
  • केस संख्या: CWP-24038-2021 (O&M)
  • बेंच: जस्टिस संदीप मौदगिल
  • तारीख: 13 मार्च, 2026

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