बैंक खातों को पूरी तरह से फ्रीज करना अवैध; पुलिस को धारा 106 BNSS के तहत ग्रहणाधिकार राशि निर्दिष्ट करनी होगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस द्वारा जारी किए गए ‘डेबिट फ्रीज’ नोटिस को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना विवादित राशि बताए या जब्ती आदेश (Seizure Order) दिए बिना पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना “अवैध और मनमाना” है।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मनजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत जांच एजेंसियां केवल संदेह के आधार पर किसी पूरे वित्तीय खाते को ब्लॉक करने की मांग नहीं कर सकती हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खाते को तत्काल प्रभाव से डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया और जोर दिया कि पुलिस को बीएनएसएस की धारा 94 और 106 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका खालसा मेडिकल स्टोर ने अपने प्रोपराइटर यशवंत सिंह के माध्यम से दायर की थी, जिसमें एक्सिस बैंक में उनके बैंक खाते को फ्रीज किए जाने को चुनौती दी गई थी। यह डेबिट फ्रीज साइबराबाद के राचकोंडा स्थित साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारी (IO) द्वारा बीएनएसएस की धारा 94/106 के तहत जारी नोटिस के बाद किया गया था। यह कार्रवाई अपराध संख्या 520/2025 के संबंध में की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पीड़ित के खाते से धोखाधड़ी कर पैसे इस खाते में ट्रांसफर किए गए थे।

याचिकाकर्ता के वकील श्री जलज कुमार गुप्ता ने खाते को फ्रीज करने का विरोध किया। एक्सिस बैंक की ओर से पेश हुए वकील श्री अमित जायसवाल ओजस ने बताया कि बैंक को 21 नवंबर, 2025 को डेबिट फ्रीज का नोटिस मिला था। हालांकि, बैंक ने कोर्ट को सूचित किया कि उसे पुलिस से न तो कोई औपचारिक जब्ती आदेश प्राप्त हुआ और न ही उस विशिष्ट राशि का कोई संकेत दिया गया जिसे ‘लियन’ (Lien) पर रखा जाना था। बैंक द्वारा जांच अधिकारी को कई पत्र लिखने के बावजूद, कोई दस्तावेज या विवरण प्रदान नहीं किया गया।

गौर करने वाली बात यह है कि कई नोटिस दिए जाने के बावजूद तेलंगाना से जांच अधिकारी की ओर से कोई भी कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ।

READ ALSO  दिल्ली की अदालत ने देश भर में आतंकवादी हमले करने की साजिश रचने के आरोप में आईएम के चार आतंकियों को दोषी ठहराया

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने बीएनएसएस, 2023 की धारा 106 (संपत्ति जब्त करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति) और धारा 94 (दस्तावेज या अन्य चीजें पेश करने के लिए समन) के प्रावधानों का विस्तार से परीक्षण किया।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम तापस डी. नियोगी (1999) और तीस्ता अतुल सीतलवाड़ बनाम गुजरात राज्य (2018) शामिल हैं। इन फैसलों में स्थापित किया गया था कि हालांकि बैंक खाता जब्ती के लिए “संपत्ति” माना जाता है, लेकिन इसकी रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने विशेष रूप से राजस्थान हाईकोर्ट के धर्मेंद्र चावड़ा हरीश भाई बनाम राजस्थान राज्य और केरल हाईकोर्ट के डॉ. सजीर बनाम भारतीय रिजर्व बैंक के मामलों में तय सिद्धांतों पर भरोसा जताया, जिनमें कहा गया था कि फ्रीज करने का आदेश कथित अपराध की आय के अनुपात में होना चाहिए, न कि पूरे खाते पर लागू होना चाहिए।

कानून का विश्लेषण करते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साइबर अपराध मामलों में बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांत निर्धारित किए:

  • उचित विश्वास (Reasonable Belief): बीएनएसएस की धारा 106 पुलिस अधिकारियों को “मात्र संदेह” के आधार पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं देती है; कार्रवाई “उचित विश्वास” द्वारा समर्थित होनी चाहिए।
  • विशिष्ट राशि: धारा 106 के तहत नोटिस में कथित रूप से ट्रांसफर की गई विशिष्ट राशि पर ‘लियन’ मार्क करने की आवश्यकता हो सकती है। कोर्ट ने कहा: “किसी भी स्थिति में पुलिस किसी बैंक या भुगतान प्रणाली ऑपरेटर से… पूरे वित्तीय खाते को ब्लॉक या निलंबित करने के लिए नहीं कह सकती या अनुरोध नहीं कर सकती है।”
  • अनिवार्य जानकारी: पुलिस को बैंक को एफआईआर (FIR) की एक प्रति और जब्ती आदेश उपलब्ध कराना होगा।
  • मजिस्ट्रेट को सूचना: ब्लॉक या लियन के संबंध में जानकारी 24 घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजी जानी चाहिए। ऐसा न करने पर कार्रवाई “शून्य” (Void) मानी जा सकती है।
READ ALSO  शिवसेना (यूबीटी) नेता के सहयोगी सदानंद कदम को रिसॉर्ट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 15 मार्च तक ईडी की हिरासत में भेजा गया

निर्णय

कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी बैंक को जारी नोटिस में किसी भी विशिष्ट राशि का उल्लेख करने में विफल रहे। इसके अलावा, अनुरोध के बावजूद बैंक को न तो एफआईआर की प्रति और न ही जब्ती आदेश प्रदान किया गया।

निर्णय लिखवाते हुए न्यायमूर्ति सराफ ने कहा:

“हमारे विचार में, यह पूरी कार्रवाई अनुचित और अवैध है। कोई ऐसी स्थिति समझ सकता है जहां अपराध की आय को हटाए जाने से रोकने के लिए सीमित अवधि के लिए खाते को फ्रीज करने की आवश्यकता हो। हालांकि, इन चरम मामलों में भी, जांच अधिकारी के लिए यह अनिवार्य है कि वह तीन से चार दिनों के भीतर बैंक को बैंक खाते पर लियन लगाने के लिए पारित जब्ती आदेश, वह केस नंबर जिसके आधार पर ऐसा लियन/फ्रीजिंग किया जा रहा है, और साथ ही वह राशि जिस पर लियन बनाया जाना है, प्रदान करे।”

नतीजतन, कोर्ट ने विवादित नोटिस को रद्द कर दिया और बैंक को निर्देश दिया कि वह “याचिकाकर्ता के खातों को तुरंत डी-फ्रीज करे और याचिकाकर्ता को अपनी सामान्य बैंकिंग गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति दे।”

READ ALSO  जिला जज के पद के लिए अच्छे उम्मीदवार नहीं मिल रहे: सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: खालसा मेडिकल स्टोर जरिए प्रोपराइटर यशवंत सिंह बनाम भारतीय रिजर्व बैंक जरिए गवर्नर और 3 अन्य
  • केस नंबर: रिट-सी नंबर 12211 ऑफ 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मनजीव शुक्ला
  • याचिकाकर्ता के वकील: जलज कुमार गुप्ता
  • प्रतिवादी (बैंक) के वकील: अमित जायसवाल ओजस

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles