बेटी की गवाही को ‘वैवाहिक विवादों से प्रेरित’: दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में पिता को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी नाबालिग बेटी के यौन शोषण के आरोपी एक व्यक्ति को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष (prosecutrix) यानी बेटी की गवाही सच्चाई पर आधारित होने के बजाय “माता-पिता के बीच के विवादों से प्रेरित” प्रतीत होती है। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

यह अपील दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 378(1) के तहत दायर की गई थी, जिसमें प्रतिवादी शील कुमार को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। शील कुमार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 8 और 12 के तहत आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता (मां) और पीड़िता (बेटी) की गवाही में भारी विरोधाभास था और आरोप वैवाहिक घर से बेदखल होने के डर से बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले की शुरुआत 8 जून 2014 को पीड़िता की मां द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनका पति शराब का आदी है और वह अक्सर उनके साथ मारपीट करता है और उनकी 13 वर्षीय बेटी का यौन उत्पीड़न करता है। पुलिस स्टेशन नांगलोई में आईपीसी की धारा 323/354 और पॉक्सो एक्ट की धारा 12 के तहत एफआईआर (संख्या 0387/2014) दर्ज की गई थी।

आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए, लेकिन उसने खुद को निर्दोष बताया और कहा कि पत्नी के साथ चल रहे विवादों के कारण उसे झूठा फंसाया गया है। अभियोजन पक्ष ने पांच गवाह पेश किए। 10 जनवरी 2020 को विद्वान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने आरोपी को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

अभियोजन पक्ष की दलीलें

राज्य ने तर्क दिया कि विद्वान एएसजे ने पीड़िता की गवाही का सही मूल्यांकन नहीं किया, जो सजा के लिए पर्याप्त थी। अतिरिक्त लोक अभियोजक ने कहा कि पीड़िता ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत अपने बयान और मुख्य परीक्षा (examination-in-chief) में लगातार बयान दिए थे।

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हालांकि 18 दिसंबर 2019 को जिरह (cross-examination) के दौरान पीड़िता अपने बयानों से मुकर गई (hostile) थी, फिर भी अभियोजन ने खुज्जी @ सुरेंद्र तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1991) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि एक पक्षद्रोही गवाह (hostile witness) के साक्ष्य को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता यदि उसे अन्य सबूतों से समर्थन मिलता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने गवाहों के बयानों और शुरुआती शिकायत में मौजूद विसंगतियों का बारीकी से विश्लेषण किया।

  • शिकायतकर्ता का पक्षद्रोही होना: कोर्ट ने नोट किया कि मां (PW-2) ट्रायल के दौरान पूरी तरह से पक्षद्रोही हो गई थी और अपनी ही शिकायत की सामग्री से इनकार कर दिया, हालांकि उसने अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए थे।
  • धारा 164 के बयान का विश्लेषण: कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए अपने बयान में, मां ने मुख्य रूप से ससुराल वालों द्वारा घर से निकाले जाने की आशंका जताई थी। कोर्ट ने कहा, “शिकायतकर्ता के धारा 164 सीआरपीसी के बयान से मूल रूप से यह उभर कर आता है कि… वह बेटी की सुरक्षा के लिए डर रही थी और उसे आशंका थी कि उसके साथ कुछ गलत हो सकता है।” एफआईआर में लगाए गए यौन इरादे के विशिष्ट आरोप इस बयान में अनुपस्थित या कमजोर थे।
  • पीड़िता की गवाही में विरोधाभास: कोर्ट ने बेटी की गवाही को “अतिशयोक्तिपूर्ण और विरोधाभासों से भरा” पाया। पीड़िता ने गवाही दी थी कि उसके पिता उसे नहाते हुए देखते थे, लेकिन यह आरोप न तो धारा 164 के बयान में था और न ही मां की शिकायत में। कोर्ट ने इसे “अतिशयोक्ति” (exaggeration) करार दिया।
  • चिकित्सकीय आरोप: पीड़िता ने दावा किया था कि पिता द्वारा सीने पर मुक्का मारने से उसे तपेदिक (Tuberculosis) हो गया। इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि यह मुश्किल से 13 साल की बच्ची की कल्पना है, क्योंकि केवल मुक्का मारने से तपेदिक नहीं हो सकता।”
  • प्रेरित गवाही: कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पीड़िता ने खुद स्वीकार किया था कि घर से बेदखली को लेकर उसके दादा-दादी और माता-पिता के बीच मुकदमेबाजी चल रही थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से सहमति जताई कि गवाही इन घरेलू विवादों से प्रभावित थी। न्यायमूर्ति कृष्णा ने कहा, “यह एक ऐसा मामला है जहां अभियोजन पक्ष (बेटी) की गवाही सच्ची नहीं लगती, बल्कि माता-पिता के बीच के विवादों से प्रेरित लगती है।”
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कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 2019 में दोबारा जिरह के दौरान, जब माता-पिता अलग रहने लगे थे, तब पीड़िता ने कहा था कि वह “नहीं चाहती कि उसके पिता को सजा मिले।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष का मामला “संदेह के दायरे में” रहा। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि न पाते हुए, न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपील खारिज कर दी और पिता को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।

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केस विवरण:

  • केस टाइटल: स्टेट एनसीटी ऑफ दिल्ली बनाम शील कुमार
  • केस नंबर: CRL.A. 1641/2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा

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