छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 और 2021 के कथित सीजीपीएससी (छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग) परीक्षा घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आयोग के पूर्व अध्यक्ष तमन सिंह सोनवानी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) की धारा 45(1) के परंतुक (प्रोविजो) में उल्लिखित चिकित्सीय अपवाद का लाभ तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि किसी जानलेवा बीमारी या हिरासत में अपर्याप्त इलाज का ठोस प्रमाण न हो। जस्टिस बिभू दत्त गुरु ने कहा कि पीएमएलए की धारा 45 के तहत अनिवार्य दोहरी शर्तें (ट्विन कंडीशंस) पूरी नहीं हुई हैं, क्योंकि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया पूर्व लोक सेवक को अपराध की आय के सृजन, रूटिंग और लॉन्ड्रिंग से जोड़ती है।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत वर्ष 2020 और 2021 में आयोजित सीजीपीएससी राज्य सेवा परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं से हुई थी। इस संबंध में आर्थिक अपराध शाखा/भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ईओडब्ल्यू/एसीबी), रायपुर ने 7 फरवरी 2024 को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 120-बी और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 7ए और 12 के तहत प्राथमिकी संख्या 05/2024 दर्ज की थी। इसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जांच अपने हाथ में लेते हुए 9 जुलाई 2024 को आरसी संख्या आरसी1242024ए0004 दर्ज की। सीबीआई ने 16 जनवरी 2025 को आरोप-पत्र तथा 26 सितंबर 2025 और 31 दिसंबर 2025 को पूरक आरोप-पत्र दाखिल किए।
मूल अपराधों के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), रायपुर जोनल कार्यालय ने 27 मार्च 2024 को पीएमएलए की धारा 3 के तहत अपराध और धारा 4 के तहत दंडनीय मामले में ईसीआईआर संख्या ईसीआईआर/आरपीजेडओ/01/2024 दर्ज की। सीजीपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष रहे 65 वर्षीय आवेदक को ईडी ने जुलाई 2026 में गिरफ्तार किया था। विशेष अदालत (पीएमएलए), रायपुर ने 20 अगस्त 2026 को उनकी नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 483 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 14 जुलाई 2021 को भर्ती नियमों में संशोधन कर ‘परिवार’ की परिभाषा से ‘भतीजा’ शब्द हटा दिया गया था, जिससे आवेदक के भतीजों—नितेश सोनवानी और साहिल सोनवानी—का चयन क्रमशः डिप्टी कलेक्टर और पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के पद पर कराने में सुविधा हुई।
ईडी का यह भी आरोप है कि मैसर्स श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड ने अपने निदेशक श्रवण कुमार गोयल के माध्यम से ‘कला महाविद्यालय’ नामक परियोजना के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) अंशदान के नाम पर ग्रामीण विकास समिति को 45,00,000 रुपये हस्तांतरित किए। एजेंसी के अनुसार, यह राशि प्रश्नपत्र लीक कराने की अवैध रिश्वत थी, जिसके एवज में श्रवण गोयल के बेटे शशांक गोयल और बहू भूमिका कटियार का चयन डिप्टी कलेक्टर पद पर कराया गया। इसके अतिरिक्त, ईडी ने आरोप लगाया कि आवेदक के परिवार द्वारा नियंत्रित ग्रामीण विकास समिति ने बिचौलियों के माध्यम से 33 से अधिक उम्मीदवारों से प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र देने के बदले लगभग 3 करोड़ रुपये एकत्र किए। ईडी द्वारा पहचानी गई कुल अपराध की आय लगभग 3.45 करोड़ रुपये आंकी गई। पीएमएलए की धारा 17 के तहत 3 जून 2026 को की गई तलाशी में दस्तावेज, डिजिटल सामग्री और 8,45,000 रुपये नकद बरामद हुए थे। इसके बाद 21 सितंबर 2026 को संपत्तियों की अनंतिम कुर्की का आदेश जारी हुआ और 22 सितंबर 2026 को आवेदक तथा छह अन्य के खिलाफ अभियोजन शिकायत (चार्जशीट) दायर की गई।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील ओटवानी ने दलील दी कि आरोप पूरी तरह से जांच एजेंसियों द्वारा पहले से एकत्र किए गए दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने पीएमएलए के तहत गिरफ्तारी से काफी पहले ही अपना आरोप-पत्र और पूरक आरोप-पत्र दाखिल कर दिए थे और गिरफ्तारी के बाद कोई नई बरामदगी नहीं हुई है। आवेदक का कोई अन्य आपराधिक इतिहास नहीं है और चल रही जांच में इतने समय बाद हुई गिरफ्तारी निरंतर हिरासत का औचित्य साबित नहीं करती।
आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 29 अक्टूबर 2025 को सह-आरोपी शशांक गोयल, भूमिका कटियार, नितेश सोनवानी और साहिल सोनवानी को दी गई जमानत का हवाला देते हुए समानता (पैरिटी) के आधार पर राहत मांगी। चिकित्सीय आधार पर बचाव पक्ष ने बताया कि आवेदक को 19 अगस्त 2026 को बेहोशी और ब्रैडीकार्डिया (हृदय गति धीमी होना) की शिकायत हुई थी, जिसके बाद 20 अगस्त 2026 को पं. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज एवं डॉ. बी.आर.ए.एम. अस्पताल, रायपुर में अस्थायी पेसमेकर लगाया गया। डॉक्टरों द्वारा स्थायी पेसमेकर लगाने की सलाह का उल्लेख करते हुए वकील ने पीएमएलए की धारा 45(1) के ‘बीमार या अशक्त’ संबंधी परंतुक को लागू करने का आग्रह किया।
जमानत याचिका का विरोध करते हुए प्रवर्तन निदेशालय के वकील डॉ. सौरभ पांडे ने तर्क दिया कि आवेदक ने भर्ती नियमों में हेरफेर करने, प्रश्नपत्र लीक करने और ग्रामीण विकास समिति के माध्यम से अपराध की आय को ठिकाने लगाने में सक्रिय व विशिष्ट भूमिका निभाई। एजेंसी ने बताया कि समिति पर आवेदक का वास्तविक नियंत्रण था; उनकी पत्नी पद्मिनी सोनवानी अध्यक्ष, भाई अनिल कुमार सोनवानी सचिव और सीजीपीएससी के तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक ललित गनवीर कोषाध्यक्ष थे, जो आवेदक के निर्देशों पर बैंक खाता संचालित करते थे। ईडी ने यह भी कहा कि आवेदक ने पीएमएलए की धारा 50 के बयानों में टालमटोल भरा रुख अपनाया और अपने परिवार के सदस्यों पर जिम्मेदारी डालने का प्रयास किया।
समानता के तर्क पर ईडी ने कहा कि आवेदक की भूमिका पूरे षड्यंत्र को रचने और धन को रूट करने वाले आयोग अध्यक्ष की थी, जो प्रश्नपत्र पाने वाले लाभार्थियों से पूरी तरह भिन्न है। चिकित्सीय स्थिति पर ईडी ने कहा कि स्थायी पेसमेकर लगाने सहित पर्याप्त चिकित्सा देखभाल न्यायिक हिरासत में रहते हुए विशेषज्ञ सरकारी अस्पतालों जैसे पं. जे.एन.एम. मेडिकल कॉलेज एवं डॉ. बी.आर.ए.एम. अस्पताल, रायपुर या एम्स रायपुर में कराई जा सकती है। ईडी ने केंद्रीय जेल, रायपुर के अधीक्षक द्वारा 29 सितंबर 2026 को पारित आदेश भी रिकॉर्ड पर रखा, जिसमें अस्पताल ले जाने के दौरान सुरक्षा में लापरवाही और सोशल मीडिया पर प्रसारित अनधिकृत बैठक की जांच के बाद तीन जेल कर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था। ईडी ने इसे गवाहों को प्रभावित किए जाने की गंभीर आशंका बताया।
कोर्ट का विश्लेषण और नजीरें
पीएमएलए की धारा 45 के तहत निर्धारित वैधानिक सीमा पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि जब लोक अभियोजक जमानत का विरोध करता है, तो कोर्ट को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि यह मानने के उचित आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ, (2022) 10 एससीसी 386 का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“401. हम रणजीतसिंह ब्रह्मजीतसिंह शर्मा [(2005) 5 एससीसी 294] में कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी से सहमत हैं। जमानत अर्जी पर विचार करते समय कोर्ट को मामले के गुण-दोष में गहराई से जाने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर केवल कोर्ट का एक दृष्टिकोण अपेक्षित होता है। कोर्ट आरोपी का दोष तय करने के लिए साक्ष्यों का परीक्षण नहीं करेगा, जो कि ट्रायल कोर्ट का काम है। कोर्ट को केवल जांच के दौरान एकत्र की गई उचित सामग्री के आधार पर संभावनाओं के आलोक में अपना दृष्टिकोण रखना होता है और यह दृष्टिकोण ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकदमे के दौरान पेश साक्ष्यों के आधार पर दोष या दोषमुक्ति तय करते समय ध्यान में नहीं रखा जाएगा। जैसा कि इस कोर्ट ने निम्मागड्डा प्रसाद [(2013) 7 एससीसी 466] में स्पष्ट किया है, 2002 अधिनियम की धारा 45 में प्रयुक्त ‘मानने के उचित आधार’ शब्दों का अर्थ है कि कोर्ट को केवल यह देखना है कि क्या आरोपी के खिलाफ कोई वास्तविक मामला बनता है और अभियोजन पक्ष को संदेह से परे आरोप सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।”
कोर्ट ने सतीश जग्गी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, (2007) 11 एससीसी 195 का उल्लेख किया, जिसमें तय किया गया था कि जमानत के स्तर पर अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता की जांच नहीं की जा सकती। दिल्ली हाईकोर्ट के संजय जैन बनाम प्रवर्तन निदेशालय मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि इस चरण पर साक्ष्यों का बारीकी से मूल्यांकन स्वीकार्य नहीं है। आर्थिक अपराधों की गंभीरता पर कोर्ट ने वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी बनाम सीबीआई, (2013) 7 एससीसी 439 के अंश उद्धृत किए:
“34. आर्थिक अपराध एक अलग श्रेणी में आते हैं और जमानत के मामले में इनके साथ अलग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है। गहरे षड्यंत्रों और भारी मात्रा में सार्वजनिक धन के नुकसान से जुड़े आर्थिक अपराधों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं और देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।”
जस्टिस गुरु ने सह-आरोपियों के साथ समानता के तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि जब आवेदक की भूमिका अध्यक्ष के रूप में नियम बदलने और अवैध धन का लेन-देन कराने की रही हो, तो लाभ पाने वाले परीक्षार्थियों के साथ समानता का सिद्धांत यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि मूल अपराध में सीबीआई जांच पूरी हो जाने से पीएमएलए के तहत स्वतंत्र जांच समाप्त या सीमित नहीं हो जाती।
पीएमएलए की धारा 45(1) के परंतुक के तहत चिकित्सीय आधार का मूल्यांकन करते हुए कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के केवल कृष्ण कुमार बनाम प्रवर्तन निदेशालय, 2023 एससीसी ऑनलाइन डेल 1547 (जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पवन उर्फ टमाटर बनाम रामप्रकाश पांडे और महेंद्र मणिलाल शाह फैसलों का विश्लेषण शामिल था) तथा सुप्रीम कोर्ट के उत्तर प्रदेश राज्य बनाम गायत्री प्रसाद प्रजापति, (2022) 15 एससीसी 515 निर्णय का संदर्भ लिया। कोर्ट ने पुष्टि की कि इस चिकित्सीय अपवाद के लिए यह निष्कर्ष आवश्यक है कि हिरासत में उपलब्ध उपचार अपर्याप्त है:
“पीएमएलए के उद्देश्यों और कारणों, वित्त विधेयक 2018, 268वीं विधि आयोग रिपोर्ट और पूर्वोक्त निर्णयों के संयुक्त अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि धारा 45(1) पीएमएलए का परंतुक बीमार या अशक्त व्यक्तियों के लिए एक छूट है, बशर्ते उनकी बीमारी या अशक्तता इतनी गंभीर हो कि वह जीवन के लिए खतरनाक हो और जेल अस्पतालों द्वारा उसका इलाज न किया जा सके।”
कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सीय दस्तावेज पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो कि आवेदक वर्तमान में किसी ऐसी गंभीर या जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं जिसका इलाज न्यायिक हिरासत में रहते हुए राज्य के विशेषज्ञ अस्पतालों या एम्स, रायपुर में संभव न हो।
कोर्ट का निर्णय
यह मानते हुए कि आवेदक न तो धारा 45 की दोहरी शर्तों को संतुष्ट कर पाए हैं और न ही परंतुक के तहत किसी अपवाद का आधार बना पाए हैं, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“दोनों पक्षों की ओर से पेश दलीलों और मामले में प्रस्तुत सामग्री पर विचार करने के बाद, यह स्वीकार्य नहीं है कि वर्तमान आवेदक को इन लेन-देन की जानकारी नहीं थी। आरोपी द्वारा केवल इनकार कर देना ही प्रथम दृष्टया यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पीएमएलए 2002 के तहत अपराध के लिए आवेदक का कोई आपराधिक मानस (मेन्स रिया) नहीं था।”
“जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, यह नहीं कहा जा सकता कि प्रश्नगत अपराध में आवेदक की कोई संलिप्तता नहीं है। अपराध की आय से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आवेदक की भूमिका को देखते हुए यह पाया जाता है कि ईडी/उत्तरदाता द्वारा एकत्र किए गए पर्याप्त साक्ष्य प्रथम दृष्टया मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में आवेदक की संलिप्तता दर्शाते हैं। यह कई पहलुओं वाला एक संगठित अपराध है, इसलिए पीएमएलए 2002 की धारा 45 के प्रावधानों पर विचार करते हुए यह कोर्ट संतुष्ट है कि यह मानने के उचित आधार मौजूद हैं कि आवेदक अपराध में शामिल है और जमानत पर रहने के दौरान उसके कोई अन्य अपराध करने की संभावना है।”
जमानत याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 483 सहपठित पीएमएलए की धारा 45 के तहत दायर नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: तमन सिंह सोनवानी बनाम प्रवर्तन निदेशालय
वाद संख्या: एमसीआरसी संख्या 8189/2026
पीठ: जस्टिस बिभू दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

