पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकारियों को नामित कर सकता है जिला मजिस्ट्रेट: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक’ (PC & PNDT) अधिनियम, 1994 के तहत शिकायत केवल ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ (Appropriate Authority) द्वारा ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा अधिकृत किसी भी अधिकारी द्वारा दर्ज की जा सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट, जो उपयुक्त प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हैं, उनके पास कानूनी कार्रवाई शुरू करने की शक्ति को डेलिगेट (प्रत्यायोजित) करने का अधिकार है।

यह आदेश न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने डॉ. गायत्री सिंह द्वारा दायर धारा 482 सीआरपीसी के तहत एक आवेदन को खारिज करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने अधिनियम की धारा 23 के तहत दर्ज मामले में अपनी डिस्चार्ज अर्जी खारिज होने के आदेशों को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रकरण की शुरुआत 18 नवंबर 2008 को लखनऊ के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी (ACMO) डॉ. ए.के. चौधरी द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी। यह शिकायत 13 नवंबर 2008 को ‘मां चंद्रिका देवी मैटरनिटी एंड सर्जिकल सेंटर’ में की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के बाद दर्ज की गई थी।

मैजिस्ट्रेट ने 20 नवंबर 2008 को इस शिकायत पर संज्ञान लिया। याचिकाकर्ता, जो वहां स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत थीं, ने डिस्चार्ज के लिए आवेदन किया था, जिसे 13 जून 2024 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने खारिज कर दिया। इसके बाद विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने भी 18 नवंबर 2025 को याचिकाकर्ता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने मुख्य रूप से दो कानूनी बिंदु उठाए:

  1. अनधिकृत शिकायतकर्ता: तर्क दिया गया कि एसीएमओ (ACMO) अधिनियम की धारा 17 के तहत ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ नहीं हैं। वकील के अनुसार, धारा 28 के तहत केवल जिला मजिस्ट्रेट ही शिकायत दर्ज कर सकते थे और प्राधिकारी का कोई एक सदस्य इस तरह की कार्रवाई के लिए किसी को अधिकृत नहीं कर सकता।
  2. कारणों का अभाव: यह भी तर्क दिया गया कि धारा 30 के तहत कार्रवाई करते समय जिला मजिस्ट्रेट के लिए कारणों को रिकॉर्ड करना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं किया गया।
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याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रविंदर कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2024) और इस अदालत की एक समन्वय पीठ के फैसले डॉ. विनोद कुमार बस्सी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) पर भरोसा जताया।

वहीं, राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि अधिनियम की धारा 28(1)(ए) स्पष्ट रूप से “उपयुक्त प्राधिकारी या केंद्र/राज्य सरकार या उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा इस संबंध में अधिकृत किसी भी अधिकारी” द्वारा शिकायत दर्ज करने की अनुमति देती है। उन्होंने बताया कि जिला मजिस्ट्रेट ने 18 अगस्त 2008 के आदेश के माध्यम से एसीएमओ को शिकायत दर्ज करने के लिए विशेष रूप से अधिकृत किया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अदालत ने पीसी एंड पीएनडीटी अधिनियम की धारा 17 और 28 के प्रावधानों का बारीकी से परीक्षण किया। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने कहा कि प्राधिकार (Authorization) का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही तय किया जा चुका है।

सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम मनविंदर सिंह गिल (2015) मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने उद्धृत किया:

“धारा 28(1)(ए) के तहत धारा 17(3) के अंतर्गत अधिसूचित ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ द्वारा अधिकृत कोई भी अधिकारी अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू करने का हकदार होगा।”

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत डॉ. विनोद कुमार बस्सी मामले में समन्वय पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के मनविंदर सिंह गिल वाले फैसले पर विचार नहीं किया था।

तलाशी अभियान में कारणों की कमी के तर्क पर कोर्ट ने पाया कि 13 नवंबर 2008 का आदेश नियमावली 1996 के नियम 11 के तहत जारी किया गया था, जो निरीक्षण से संबंधित है। कोर्ट ने कहा:

“नियम 11 आगे यह प्रावधान करता है कि उपयुक्त प्राधिकारी इस संबंध में कार्य करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को अधिकृत कर सकता है और इस प्राधिकार आदेश में कोई अवैधता नहीं है।”

इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 482 के तहत सुनवाई करते समय वह “मिनी-ट्रायल” नहीं कर सकती। साक्ष्यों की गुणवत्ता पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति ने कहा:

“इस न्यायालय का अंतर्निहित क्षेत्राधिकार साक्ष्यों के प्रोबेटिव वैल्यू (प्रमाणिक मूल्य) का आकलन करने तक विस्तारित नहीं है, यह ट्रायल के दौरान निर्धारित किया जाने वाला विषय है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया प्राधिकार वैध था और शिकायत सुनवाई योग्य थी। हाईकोर्ट ने याचिका में कोई सार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया।

केस विवरण

केस का शीर्षक: गायत्री नंजुंदप्पा @ डॉ. गायत्री सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य

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केस संख्या: आवेदन धारा 482 संख्या 871 वर्ष 2026 

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